हिंडन जगाने के लिए जानना जरूरी

Guest blog by Arun Tiwari (amethiarun@gmail.com)

हिंडन के नाम पर यात्रायें हुईं। हिंडन के नाम पर संस्थायें बनी। हिंडन के नाम पर आज अपार्टमेंट हैं; प्रतिष्ठान हैं; पत्रिका है; पार्क हैं; नारे हैं; अनशन है; कार्यकर्ता हैं; मुकदमें हैं; आदेश हैं; बजट है; किंतु दुर्योग है तो बस यही कि हिंडन का वह स्वरूप नहीं है, जिसके लिए हिंडन जानी जाती है। हिंडन, आज उत्तर प्रदेश की सबसे अधिक और भारत का दूसरा सबसे अधिक प्रदूषित प्रवाह है। हिंडन को पौराणिक स्वरूप कभी लौट सकता है; आज यह सपना लेना भी मुश्किल है। इस सपने को लेने का दुस्साहस केवल वही कर सकता है, जो हिंडन को अपने प्राणों से अधिक मानता हो। जो हिंडन को जानता नहीं, वह क्या मानेगा ? यूं भी जो जानता नहीं, वह हिंडन के दुख से न दुखी हो सकता है और न हिंडन के दुख निवारण में समर्थ। इसके लिए हिंडन की देह, संगी, हितैषी और दुश्मनांे की पहचान जरूरी है।
Hindon campaign in villages Photos by Vikrant Sharma

Hindon campaign in villages Photos by Vikrant Sharma

आइये, पहचान करें:
हिंडन: कहां से कहां तक ? ये ही क्षेत्र आज उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश के संधि क्षेत्र हैं। हिंडन, उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके से निकलने वाला एक प्रमुख प्रवाह है। इसका जन्म गंगा-यमुना के दोआब जिला सहारनपुर के उत्तर-पूर्वी इलाके के गांव-’पुर का टांडा’ के निकट से होता है। यहीं से यह प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर विस्तार पाता है। यह भू-भाग, समुद्र तल से 350 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कालीवाला पहाङियों का निचला उच्च मैदानी हिस्सा है। इस्लाम नगर और औरंगाबाद, इस इलाके के प्रमुख गांव है। सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद जिले से होकर हिंडन का प्रवाह अंततः जिला गौतमबुद्ध नगर, गांव तिलवाङा के दक्षिण में स्थित यमुना में विलीन हो जाता है।
हिंडन: नाम बदला, देह भी यहां हम जिस प्रवाह की चर्चा कर रहे हैं, उसे कभी किसी ने हरनेन्द्री कहा, तो कभी किसी ने हरिनन्दी और किसी ने हरनन्दी यानी शिव का नन्दी। हरिद्वार और सहारनपुर: पौराणिक संदर्भों के अनुसार, हरिद्वार को शैव क्षेत्र का प्रवेश द्वार कहा जाता है और सहारनपुर को शिव के नंदी का आसन। इसका, हरनन्दी के मूल नामकरण से संबंध है। इस बीच अंग्रेज आये। भारत…इंडिया हुआ और हरनन्दी.. हिंडन। किंतु यदि मूल नाम पर गौर करें, तो नन्दी एक पुल्लिंग शब्द है। ऐसे मंे हरनन्दी, स्त्रीलिंग कैसे हो सकता है ? नामकरण पर जायें तो दामोदर, सोन और ब्रह्मपुत्र की तरह, हरनन्दी को भी एक नद्य कहना उचित होगा। नद्य का ढाल अधिक होता है और प्रवाह भी अधिक कटाव युक्त। इससे मूल हरनन्दी की देह का मोटा अंदाजा लगा सकते हंै। किंतु उद्गम से संगम का वर्तमान ढाल और वेग को देखें, तो दूसरा अंदाजा यह भी लगा सकते हैं कि कालयोग ने इस प्रवाह का नाम ही नहीं बदला, स्वरूप भी बदल दिया है।
हिंडन के उद्गम स्थल की समुद्र तल से ऊंचाई, 350 मीटर है। संगम स्थल, समुद्र तल से 195 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। उद्गम से संगम के बीच ऊंचाई का अंतर,  155 मीटर है। उद्गम से संगम का सफर 260 किलोमीटर है। 155 मीटर को 260 किलोमीटर से भाग दीजिए। हिंडन का औसत ढाल निकलता है, 60 सेंटीमीटर प्रति किलोमीटर। ढाल का औसत बहुत कम है। इसी कम औसत ने हिंडन को बुजुर्ग बना दिया है। स्पष्ट है कि हिंडन का प्रवाह, अब जवां नद्य जैसा न होकर, बूढे नद्य जैसा हो गया है।
Hindon campaign in villages Photo by Vikrant Sharma

Hindon campaign in villages Photo by Vikrant Sharma

हिंडन: देह और इसके निर्माता किसी भी जल प्रवाह को जानना, उसकी देह को जानने जैसा ही है। हिंडन की देहयष्टि की जानकारी इसके बदले नाम से भी आपने जानी  और फिर वर्तमान वेग और ढाल से भी। हिंडन के उद्गम स्त्रोतों में बारिश के बाद कदाचित ही पानी रहता है। बावजूद इसके हिंडन बरसाती प्रवाह कभी नहीं रहा। हिंडन की देह हमेशा पानीदार बनी रहती है। क्यों ? क्योंकि हिंडन के उद्गम पर कटावयुक्त कई ऐसी जलसंरचनायें हैं, जहां संचित वर्षा जल आगे चलकर हिंडन की 260 किलोमीटर लंबी देह का निर्माण करती हैं। कहना न होगा कि कई संगी-साथी मिलकर किसी भी नदी या नद्य की देह को मिलकर बनाते हैं। कैसे ? आइये, हिंडन की देहयष्टि को इस एक नक्शे से समझते हैं।
ंिहंडन को इसकी सहायक धाराओं के साथ नक्शे पर देखिए। पेङ की  एक मुख्य आधार शाखा से निकली टेढी-मेढी लंबी उपशाखा जैसा दिखता है, हिंडन का प्रवाह। यदि सहारनपुर और मुजफ्फरनगर के इलाके में आसपास फैले मशहूर आम के बागीचों के चित्र भीे इस टहनीनुमा नक्श में शामिल कर लिए जायें, तो नक्शे वाला हिंडन नद्य, आज भी हरा-भरा दिखाई देता है। बायें, तीन छोटी और एक मोटी लंबी टहनी; दायें, ओर एक लंबी टहनी; नीचे, आधार बनी एक मोटी टहनी। ये सभी टहनियां, हिंडन की सहायक धारायें हैं; संगी-साथी। आधार टहनी, यमुना है।
41 कि.मी. लंबी नागदेई,  78 कि.मी लंबी कृष्णी, 75 कि.मी. लंबी काली, 52 कि.मी लंबी धमोला, 20 कि.मी. लंबी पांवधोई और 80 कि.मी. लंबी संेधली के अलावा कई बरसाती नाले। इन सभी की लंबाई मंे हिंडन की लंबाई जोङ लें, तो 606 कि.मी. लंबा है हिंडन का कुल प्रवाह। नागदेई का औसत ढाल 18.0 मीटर प्रति कि.मी. है, नागदेई-धमोला मिलन तक 1.2 मीटर. प्रति कि.मी., धमोला-काली मिलन तक 0.59 मीटर प्रति कि.मी., काली-कृष्णी मिलन तक 9.29 मीटर प्रति कि.मी. तथा कृष्णी-हिंडन मिलन के बीच यह ढाल 0.20 मीटर प्रति कि.मी पाया गया है।
Hindon campaign reaches a village school

Hindon campaign reaches a village school

नागदेई: सबसे पहले पश्चिम से आकर नागदेई ही हिंडन से गलबंहियां करती है। नाग जैसी सरपट दौङ लगाती है। अतः जल्दी से जल्दी मिलने के चक्कर में अपना सब रस हिंडन में उङेल देती है। खुद सूखी रहती है। बारिश बाद कदाचित ही इसमें पानी दिखता है।
धमोला: नागदेई के पश्चिम में एक गांव है – खुर्रमपुर। यह हिंडन की दूसरी सखी ’धमोला’ का मायका है। धमोला की ससुराल है – सरगथाल गांव। यहीं आकल धमोला, हिंडन से मिलती है।
पांवधोई: धमोला की छोटी बहन है – पंावधोई। यह भी हिंडन से मिलन को लालायित रहती है। हिंडन से मिलती है, किंतु धमोला में विलीन होकर। पांवधोई, सहारनपुर के ऊपरी हिस्से से आकर नगर से गुजरने के बाद धमोला मे मिल जाती है। भला हो, कभी नियुक्त हुए जिलाधीश आलोक कुमार और सहारनपुर के निवासियों का। इन्होने मिलकर नगर क्षेत्र के 8 कि.मी. लंबे हिस्से से धमोला में से 10 हजार ट्रक कचरा निकाल बाहर किया।
कृष्णी: कहने को तो कृष्णी, हिंडन की सखी है, किंतु बचपने मंे शाहपुर नाला और मंेगादयपुर नाले के साथ ज्यादा मटरगश्ती करने के कारण लोग इसे भी सहारनपुर नाले के नाम से ज्यादा जानते हैं। कैरी गांव पहुंचने पर इसे कृष्णी नाला कहने लगते हैं। दरअसल, कैरी गांव के बाद ही कृष्णी थोङी धीर-गंभीर होती है। इसका पाट चैङा हो जाता है। कृष्णी खादर का निर्माण करने लगती है; परमार्थी हो जाती है। फिर बरनावा में हिंडन से मिलने तक कृष्णी, शांत ही रहती है। कैरी से एलय तक 2-3 वर्ग किलोमीटर और एलय से बरनावा तक 5 से 10 किलोमीटर तक का खादर बनाती है। बरनावा संगम पर 12 से 15 किलोमीटर का संगम दिखाई देता है।
काली: काली, एक मात्र ऐसी सखी है, जो पूर्व दिशा से आकर हिंडन मंे मिलती है। यह धनकपुर गांव से भागकर आने वाली काली, पिटलोखर में आकर हिडन में मिलती है। मिलन से पूर्व काली, अपनी कइ्र बहनों को साथ लेकर आती है। उन्हे साथ लाने के चक्कर में खुद कई धाराओं में बंट जाती है। देवबंद नामक मशूहर कस्बे से लगभग सात किलोमीटर उत्तर में रुस्तमपुर और वनेरा खास के निकट काली जिन दो धाराओं में बंटती है, उन्हे पश्चिमी काली कहते हैं। पश्चिमी काली की एक बहन है – सिला। यह उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है।  पश्चिम से आकर हरियावास के निकट पश्चिमी काली धारा में मिलती है। इन्दूखरक के निकट से आकर मिलने वाली धारा को पूर्वी काली कहते हैं। यह बात अलग है कि काली, आज सचमुच काल के कोप की तरह व्यवहार करने को बाध्य है, किंतु मूल रूप से काली एक सदानीरा और जल से भरपूर एक स्नेह प्रदान करने वाली नदी है। सेंधली, एक प्रमुख धारा है ही।
आप समझ सकते हैं कि जिसके संगी-साथियों को हाल ऐसा है, उस हिंडन का हाल कैसा होगा ! आप देखेंगे कि मिलन से पहले हिंडन का प्रवाह इतना क्षीण और मलीन हो गया है, जैसे टी बी का मरीज सूख जाता है। यही हाल, तो दिल्ली की यमुना का है। आज हिंडन और यमुना का मिलन, एक बूढे-बीमार ऩद्य से बीमार नदी का मिलन जैसा है। दोनो को उपचार और देखभाल चाहिए। दोनो मिलकर क्या उत्कर्ष ला सकते हैं ? फिर भी यमुना में विलीन होने से पूर्व, हिंडन का प्रवाह गांव अहा चुहारपुर और गढी समसपुर मंे शानदार खादर बनाता है। हिंडन कट नामक की नहर बनकर अपने खादर को सींचने का भी इंतजाम करता है।
Essay Competition for children along Hindon

Essay Competition for children along Hindon

हिंडन: बचा-खुचा श्रृंगार इसी परमार्थी स्वभाव के कारण, हिंडन को पंचतीर्थी कहा जाता है। लाक्षागृह (बरनावा), पुरा महादेव (पुरा), वाल्मीकि आश्रम (बालैनी), महादेव मंदिर (सुराणा गांव) और गायत्री शक्तिपीठ (श्मशान घाट, मोहननगर): ये हिंडन किनारे के पंांच तीर्थ हैं। ये हिंडन की देह के साथ जुङे श्रृंगार की तरह हैं। इन वर्षों में इन तीर्थों की इमारतें खूब विशाल हुईं। कच्ची जमीन की जगह संगमरमर ने ले ली। यहां आकर माथा नवाने वालों की संख्या भी बढी। किंतु सच यह है कि हरनन्दी का पिता स्वरूप अब नष्ट हो गया है। हिंडन के बदले नाम के साथ, हमने इसे एक विषधर बनने को मजबूर कर दिया है। हिंडन क्या करे ? श्रृंगार करने के हरियाली वाली सजावटों को भी शहरीकरण की हमारी जिद्द ने हिंडन से छीन लील लिया है। हिंडन का जीवन छीनते द्वार कई हैं।
हिडन: बीमारी के द्वार धमोला-हिडन संगम से हिंडन का प्रवाह बारहमासी हो जाता है। यहीं से हिंडन की बीमारी के लक्ष्ण भी प्रकट होने लगते हैं। यह हिंडन प्रदूषण का प्रथम द्वार है। दूसरा द्वार है, काली-हिंडन संगम। यह द्वार साधारणतया कृषि और खनिज जनित द्वार खोलता है। यहां मिलें भी बङी संख्या में हैं और मुजफ्फरनगर, खतौली व देवबंद जैसे घनी आबादी के इलाके भी। इनके अवजल-मल और ठोस कचरे से हिंडन का चैन छीन गया है। प्रदूषण का तीसरा बङा द्वार खोलता है, गाजियाबाद। अत्यंत घनी आबादी का मल मोहननगर और साहिबाबाद का औद्योगिक कचरा। ये तीनो दरवाजे मिलकर, हिंडन की जिंदगी के दरवाजे बंद करने हेतु आज भी आमादा हैं। गाजियाबाद नगर निगम के कई नाले बिना ट्रीटमेट प्लांट के सीधे ंिहंडन में गिर रहे हैं। तीसरे दरवाजे के बाद तो हिंडन का दम ही घुट जाता है; साथ-साथ गाजियाबाद के कई इलाकों का भी। ऐसे इलाकों में खतरनाक बीमारियों का शिकार, हर दूसरा घर है। रही-सही कसर, मोहननगर-मेरठ बाईपास पर करहैङा पुल बनाकर पूरी कर दी गई है। इस पुल की ज्यादातर लंबी खंभों पर न होकर, भरवा मलवे पर टिकी है। कहने को यह पुल सुविधा के लिए बनाया गया है, किंतु असल में यह हिंडन का गला घोटने वाला साबित हो रहा है।
Facts about Archeological heritage at Suthari Village

Facts about Archeological heritage at Suthari Village

हिंडन के गुनहगार वर्ष – 2004 में हिंडन कार्यकर्ताओं ने यात्रा की। साधारण समझ और आंखों से उन्होने प्रथम दृष्टया जो कुछ देखा, उसके आधार पर कई को हिंडन की बीमारी का दोषी माना। अकेले सहारनपुर में ही हिंडन की हत्या के कई दोषी चिन्हित किए। उन्होने 13 फैक्टरियों की जांच की। इनमें से मात्र दो को लेकर वे संतुष्ट दिखे:
आई टी सी (सहारनपुर) – पानी नहीं निकलता। पानी को साफकर बागवानी में इस्तेमाल करते हैं।
दया शुगर (सहारनपुर) – रंगीन बहिस्त्राव निकलता है। लोग इससे सिंचाई करते हैं। शेष हिंडन मंे मिलता है। कहते हैं कि इस रंगीन बहिस्त्राव से नहाने से खाज-खुजली ठीक हो जाती है।
यह संतुष्टि, प्रथमदृष्टया है। जरूरी नहीं कि प्रयोगशाला की जांच के बाद भी उक्त दो का कचरा प्रबंधन संतुष्ट करने लायक हो।
खैर, अन्य 11 को दोषी ठहराते हुए उन्होने लिखा:
किसान को-आॅपरेटिव शुगर फ़ैक्टरी लि. (सरसावा, सहारनपुर) –  बदबूदार प्रदूषित पानी सेंधली नदी में। हवा मंे भी बदबू।
पिलखनी केमिकल्स एंड डिस्टलरी (पिलखनी, सहारनपुर) – शराब बनाने वाली इस फैक्टरी से पीला बहिस्त्राव नाले से होकर सीधा सेंधली नदी में। हैंडपम्प ओर बोरवैल.. दोनो का पानी खराब। बीमारियां बढ रही हैं।
किसान सहकारी चीनी मिल (ननौता, सहारनपुर) – एक नाले से होकर अवजल सीधा कृष्णी नदी में। हवा चलने पर अत्यंत दुर्गंध। मच्छर ही मच्छर। किनारे बसे गंाव-भनेङा खेमचंद मंे मवेशी और इंसान.. दोनो के कम उम्र में मौत के आंकङे।
एस.एम.सी फूड लि. (ननौता, सहारनपुर) – घी और पाउडर दूध बनाने वाली इस फैक्टरी से गंदा बदबूदार पानी कृष्णी नदी में मिल रहा है।
किसान चीनी मिल (निकट ननौता, सहारनपुर) – चीनी, शराब और एल्कोहल बनाने वाली फैक्टरी से पीला बदबूदार बहिस्त्राव कृष्णी मेंै हवा में बदबू तथा बाहरमासी मच्छर।
ननौता स्थित उक्त तीनों फैक्टरियों को लेकर इस प्रथम दृष्टया रिपोर्ट के बाद गांव भनेङा खेमचंद गांव  के लोगों ने आंदोलन किया। मीडिया में भी चर्चा हुई। दिल्ली विश्ववि़द्यालय के अध्यापक रह चुके प्रोफेसर एस प्रकाश तथा सहारनपुर स्थित जैन डिग्री काॅलेज के प्रो पी के शर्मा मुख्य रूप से इसमें सहयोगी बने। फैक्टरियों पर मुकदमा भी चला और कार्रवाई भी हुई। ताजा जानकारी ज्ञात नहीं।
शाकुम्भरी शुगर एण्ड एलाॅयड लि. (रसूलपुर, सहारनपुर) – चीनी, स्टील और बिजली का उत्पादन। अत्यंत दूर्गंधयुक्त पानी नाले के जरिए यमुना मंे।
स्टार शुगर कारपोरेशन लि. (बिडवी, गंगाह रोड, सहारनपुर) – बदबूदार पानी यमुना मंे। हवा चलने पर तीखी बदबू। साधारण बोरवेल का पानी गले से नीचे नहीं उतरना। गहरे बोरवेल का पानी रखने पर बर्तन पीले हो जाते हैं।
स्टार पेपर मिल लि. (सहारनपुर) पीला व लाल रंग का प्रदूषणयुक्त बहिस्त्राव परागपुर के पास हिंडन में। इस पानी से 3-4 बार फसल सींचने पर खेत खराब।
दि को-आॅपरेटिव कंपनी लि. (यूसुफपुर-टपरी, सहारनपुर) – शराब बनाने वाली इस फैक्टरी से बदबूदार पानी निकलता है। यह स्टार पेपल मिल के पानी में मिलकर हिडन में मिलता है।
गंगेश्वर लि. (देवबंद, सहारनपुर) – लाल रंुग का पानी एक नाले से होकर काली नदी में।
शाकुम्भरी शुगर एण्ड एलायड इंडस्ट्रीज लि. (टोडपुर-बेहर, सहारनपुर) – चीनी-शराब बनाने वाली इस फैक्टरी से बदबूदार पानी एक नाले से होता हुआ बूढी यमुना में मिलता है।
Essay Competition for children along Hindon - press reports

Essay Competition for children along Hindon – press reports

स्थिति बदतर वर्ष 2004 की उक्त रिपोर्ट के बाद, निस्संदेह आज स्थिति काफी बदली है। कालांतर में लोक विज्ञान संस्थान, देहरादून ने इस पर बाकायदा वैज्ञानिक अध्ययन किया था। रिपोर्ट बताती है कि हालात बेहतर होने की बजाय, बदतर हुए हैं। शहरी मल, कृषि रसायन और बेलगाम हुआ है। हिंडन की वस्तु स्थिति यह है कि रास्ते में उसे कचरा और मल के अलावा के अलावा कहीं जल भी मिलता है; यह कहना मुश्किल है। हिंडन की दुर्दशा, हिंडन ही नहीं, अब इसके किनारे के रहने वाले भी जानने लगे हैं। पता लगायेंगे, तो पता चलेगा कि कई फैक्टरियां अपने तरल कचरे को बिना शोधन बोर कर सीधे धरती में डाल रहे हैं। एक छोटे से जिले का उक्त सर्वेक्षण बताता है कि हिंडन की स्थिति काफी दुरुह है। सर्वेक्षण न भी हो, तो हिंडन को देखकर कोई भी खुली आंख सब कुछ बयां कर सकती है।
हिंडन के दर्द से बेचैन कई हिंडन ने बागपत के मशहूर खरबूजे की मिठास गायब कर दी है। यह होगा ही। जब जीवनदायी प्रवाह की इतनी उपेक्षा हो और जीवन पाने वाले सोते रहें तो उम्मीद ही कहां बचती है। शुक्र है कि हिंडन की दुर्दशा से हिंडन की कई संतानें जागी हैं; बेचैन हुई हैं। हिडन ने गांव भूपखेङी को काटा, तो कटान को लेकर गांव ने बहुत पहले गुहार की। स्थानीय नवोदय विद्यालय के विद्यार्थी जहरीला पानी पी बीमार हुए, तो शोर मचा। मुकामी गांव का हाजमा बिगङा, तो वे भी चिल्लाये। अटोर, सिरोरा, गढी, पूरनपुर नवादा, ललियाना, चमरावत, घटोली, डौलचा, बालैनी, मवीखुर्द, मवीकलां.. हिंडन के शिकार कई हैं और जागृति और लगाम लगाने की कोशिशें भी कईं।
मोहम्मदपुर, धूमकी का जयपाल गीत लिखकर जन जगा रहा है। जलपुरुष राजेन्द्र सिंह से लेकर आर्यवीर, योगेन्द्र वैदिक, खिन्दौङा का सुशील त्यागी, मशहूर बालूशाही वाले देवेन्द्र भगत, कुलदीप पुण्डीर, महंत लक्ष्यदेवानंद, रमन त्यागी, पावला के प्राचार्य ईश्वरचंद्र कौशिक, डात्र बी बी सिंह, इंजीनियर रोहित, पूर्व पुलिस उपाधीक्षक डा. सत्यदेव सिंह… कितने नाम गिनाऊं… हिंडन की व्यथा से बेचैन कई हैं। कई ऐसे जिनके नाम मुझे याद हों न हों, हिंडन नदी को अवश्य याद होंगे।
‘हरनंदी कहिन’: एक प्रयास कभी कारोबार करने वाले श्री प्रशांत वत्स, आजकल हरनंदी पुनर्जीवन के लिए यज्ञ, गोष्ठियां, चर्चा करते घूमते हैं। जहां जाते हैं, ’हरनंदी कहिन’ नामक अपनी पत्रिका की एक प्रति मुफ्त थमाकर, हरनन्दी के दर्द से लोगों को संवेदनशील करने की कोशिश करते हैं।
सभ्यता के अवशेषों ने बताई महत्ता हिंडन किनारे गांव सुठारी में खुदाई के दौरान 4000 वर्ष पुराने अवशेष मिले। यह विक्रांत व साथियों का हिंडन से भावनात्मक जुङाव ही है कि उन्हेाने अवशेषांे को संजोने की कवायद में एक पूरी बसावट को ही हरनन्दी सभ्यता का नाम दे डाला। श्री विक्रांत शर्मा, पेशे से वकील हैं और हिंडन जलबिरादरी के स्थानीय समन्वयक। उन्होने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण से कई बार अनुरोध किया – ’श्रीमान, ये अवशेष और नदी हमारी पूर्वजों की निशानी है; इन्हें संजोने में हमारा हाथ बंटाइये।’’ गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्री संतोष यादव को सुठारी गांव भी ले गये; पर भाई, हिंडन का जो हाल है, वह तो हमारे असभ्य होने की निशानी है। पहले हम सभ्य बनें, तभी तो संजो पायेंगे सभ्यता।
नगर निगम के खिलाफ सीधे एफ आई आर की तैयारी खैर, मोहन नगर के पास एक पुल के जरिये हिंडन को सिकोङने की कोशिश हुई, तो विक्रांत अदालत पहुंच गये। साथियों का साथ मिला। पहले कामयाबी मिलती दिखी, अंत में असफल हुए। असफलता में दोस्तों ने हौसला बढाया; सो निराश नहीं हुए। गुस्सा आया, तो प्रदूषण करने वाले गाजियाबाद नगर निगम के खिलाफ ही प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने निकल पङे। बोले – “यह सिर्फ प्रदूषण का मामला नहीं, हिंडन और इसके किनारे रहने वालों की हत्या का मामला है। इस पर तो हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए।’’ स्थानीय थाने और जिला स्तरीय पुलिस अधिकारियों द्वारा नामंजूर करने पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए अनुमति लेने के लिए वह सिटी मजिस्टेªट की अदालत में याचिका दायर कर चुके हैं।
अभी तक हम यह गुहार लगाते थे कि शासन-प्रशासन को यह करना चाहिए। यह शायद भारत में पहला मामला है, जब प्रदूषण को लेकर हत्या अपराध कानूनों के तहत् शासन-प्रशासन दोषी करार दिए जाने की प्रक्रिया अख्तियार की गई है। इसे लेकर टाइम्स आॅफ इंडिया में छपी एक खबर से बीबीसी लंदन में बैठे प्रोडयुसर भी भांैचक हुए। उन्होने मामले की विस्तृत जानकारी के लिए अपनी एक रिपोर्टर, विक्रांत के पास भेजी।
ग्रीन ट्रिब्युनल ने जगाई उम्मीद इस बीच मई, 2015 मे आई खबर आई कि हिंडन जलबिरादरी के प्रांतीय समन्वयक श्री कृष्णपाल सिंह ने भी ंिहंडन में कचरे को लेकर एक याचिका दायर कर दी। उनकी याचिका पर हाल ही में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने उत्तर प्रदेश शासन, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग और भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय को नोटिस जारी कर दिए है।
हिंडन नहर में कचरे पर प्रतिबंध: वसुंधरा एन्कलेव के निवासी श्री जे पी शर्मा ने हिंडन नहर में कचरे को लेकर याचिका दायर की। श्री शर्मा की याचिका पर आदेश देते हुए न्यायाधिकरण ने हिंडन नहर विशेष में कचरा फेंकने पर प्रतिबंध लगा दिया है।
समिति गठित: आदेश में कहा गया है कि यह आदेश उत्तर प्रदेश के लोगों व सार्वजनिक प्राधिकरणों पर समान रूप से लागू होगा। 12 मई की अगली तारीख तक सभी पक्षों को न्यायाधिकरण में पेश होने का आदेश दिया गया था। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने चिंता व्यक्त की थी कि जिम्मेदारियों को लेकर सभी विभाग एक-दूसरे पर डालते रहते हैं; लिहाजा, स्थानीय निगम, प्रािधकरण, सार्वजनिक संस्थान, इनके कर्मचारी तथा अधिकारी सभी अपने-अपने स्तर इसके लिए जिम्मेदार माने जायेंगे। हिंडन में कचरा डाले जाने की जांच तथा कचरा रोकने के उपाय सुझाने के लिए एक समिति भी गठित की गई है। दिल्ली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, पूर्वी दिल्ली नगर निगम के आयुक्त, दिल्ली लोक निर्माण विभाग, दिल्ली जल बोर्ड तथा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा नामित अधिकारियों को इस समितिं का सदस्य बनाया गया है।
आपात्कालीन योजना हेतु नोटिस जारी: जयहिंद नामक एक संस्था द्वारा ग्रीन ट्रिब्युनल में पेश एक अन्य याचिका में भी हिंडन और सहायक नदियों की चिंता की गई है। वकील गौरव कुमार बंसल के माध्यम से दायर यह याचिका  में आरोप लगाया गया है कि चीनी मिलों, कागज कारखानों, रासायनिक उद्योगों तथा बूचङखानों की वजह से उक्त नदियां प्रदूषित हो रही हैं। याचिका में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिए गये उस हलफनामें का भी जिक्र है, जिसमें बोर्ड ने हिंडन, काली और कृष्णी नदी में आ रहे औद्योगिक कचरे के कारण जल गुणवत्ता पर दुष्प्रभाव की बात स्वीकारी है। याचिका में मांग की गई है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नदियों में प्रदूषण रोकने की आपात्कालीन योजना तैयार करने के लिए उत्तर प्रदेश शासन को निर्देश दिए जायें।
सुखद है कि ग्रीन ट्रिब्युनल ने मांग का जवाब देने के लिए केन्द्रीय पर्यावरण एवम् वन मंत्रालय, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और उत्तर प्रदेश शासन को नोटिस जारी कर दिए गये हैं। यह नोटिस 14 मई, 2015 दिन गुरुवार को ग्रीन ट्रिब्युनल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा जारी किए गये।
शासन की नींद खुली सुखद यह भी है कि राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के दखल के बाद हिंडन को लेकर भी उत्तर प्रदेश शासन कुछ कदम उठाने पर मजबूर हुआ है। आप थोङे संतुष्ट हो सकते हैं कि देर से ही सही, उत्तर प्रदेश शासन ने हिंडन के प्रदूषण पर नजर रखने का निर्णय ले लिया है। तय किया है कि नालों की सेटेलाइट मैपिंग की जायेगी। रिमोट संेसिंग एजेंसी को सौंपी जिम्मेदारी से अपेक्षा की गई है कि आगामी दो माह के भीतर एजेंसी अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। संभव है कि यह सभी हो। किंतु उस बयान का क्या करेंगे, जो कहता है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सिर्फ जानकारी दे सकता है; कार्रवाई तो शासन-प्रशासन ही कर सकता है।
मेरा मानना है कि हमारे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, प्रदूषकों के बारे मंे यदि अधिकारिक तौर पर जानकारी ही आमजन के बीच सार्वजनिक करना शुरु कर दें, तो ही काफी हल निकल आयेगा। यदि प्रदूषक नालों, फैक्टरियों आदि के आगे यह बोर्ड लगा दिया जाय कि वे फलां नदी/झील/तालाब को प्रदूषित कर रहा है, तो स्थिति बदलेगी। जागरूकता, जिम्मेदारी लायेगी। साधारण सर्वे के बाद सार्वजनिक हुई जानकारी का अनुभव यही दर्शाता है।
हिंडन को कचरा नहीं, पानी चाहिए खबर यह भी है कि हिंडन किनारे गाजियाबाद मंे मनोरंजन पार्क बनाने की योजना पर काम काफी आगे बढ चुका है। किंतु यदि हिंडन की स्थिति सचमुच बदलनी है, तो शासन और समाज को निगरानी तथा कचरे पर प्रतिबंध से और आगे जाना होगा। सच्चाई यह है कि जिस दिन हिंडन मंे मल व अन्य तरल कचरा आना रुक जायेगा, हिंडन का प्रवाह नाम मात्र को ही रह जायेगा। हिंडन को यदि फिर से हरनंदी बनाना है, तो हिंडन किनारे के इलाकों में जलशोषण घटाना होगा;  जल संचयन बढाना होगा। हरियाली इसमें सहायक होगी ही।
एक दुर्योग यह है कि प्रदूषण के शिकार बन रहे लोग जिस रासायनिक उर्वरकों के जरिए हिंडन और खुद को प्रदूषित कर रहे हैैं, उसकी उन्हे चिंता नहीं। प्रति एकङ खपत के आधार पर आकलन करें, तो पश्चिम उत्तर प्रदेश में भारत के किसी भी हिस्से की तुलना मंे सबसे अधिक उर्वरकों का उपयोग होता है। मल और फैक्टरी कचरे की तुलना में हिंडन की सेहत के लिए यह एक ऐसी चुनौती है, जिसे प्रदूषक के रूप मंे चिन्हित कर काम नहीं हुआ। इस पर काम जरूरी है। कचरे पर रोक के साथ-साथ यह करना ही होगा। अच्छे कदम में हाथ बंटाना और गलत काम को टोकना व रोकना ही उपाय है।
हिंडन को डाॅक्टर की तलाश ंिहंडन की बीमारी लंबी है। इलाज भी लंबा ही होगा। प्रदूषण, एक कैंसर है। अतः कैंसर की भांति इसका इलाज भी सारी देह पर नहीं, प्रदूषण के मूल स्त्रोतों पर होना चाहिए। इसके लिए मरीज की निगरानी के साथ-साथ कई अच्छे डाॅक्टर भी चाहिए। क्या आप ऐसा डाॅक्टर के रूप में सेवा देना चाहेंगे ? निर्णय लीजिए और सीधे जाकर हिंडन को बताइये। कुछ नहीं, तो अपने घर और खेत का प्रदूषण कम करने से ही शुरुआत कीजिए।
[It is not necessary that SANDRP agrees with everything that is stated in Guest Blogs.]

BACKGROUND MATERIAL:

From Water Resources Info System Basin document on Ganga:
Hindon Yamuna Map (Source: WRIS Ganga Basin profile)

Hindon Yamuna Map (Source: WRIS Ganga Basin profile)

Hindon: Hindon is an important tributary of Yamuna river, which is sandwiched between two major rivers: Ganga on the left and Yamuna on the right. Hindon originates from upper southern slopes of Shivalik (lower Himalayas) in the Saharanpur district of Uttar Pradesh. It is purely rainfed river with a catchment area of about 7,083 Sq.km and this river has a total run of about 400 km. Among its major tributaries are Kali RIver (left bank) and Karsuni or Krishni (Right bank). Kali: The Kali river originates from the Doon valley (Dehradun) in the western part of Uttarakhand. The river is named Kali possibly because of the color of the river water that is black in color. From its origin up to the confluence with Hindon river, a tributary of Yamuna travels a distance of about 150 km through Saharanpur, Muzaffarnagar, Meerut and Ghaziabad districts. Despite a significant drainage area of about 750 Sq.km, mostly laying in plains the river does not carry any significant flow. Hindon Water for Agra Canal: To make the water of the Hindon available for the Agra canal, a regulating weir, consisting of 39 vents each of 3.2 m span, was constructed across that river, by means of which its discharge can be diverted through an artificial channel, known as Hinan cut into the Yamuna immediately above the Okhla weir.

Water Quality: The value of DO and BOD for the tributaries like Kali Nadi, Hindon, are not meeting the desired criteria in these rivers.

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