शौचालय निर्माण से शुचिता की ओर-1 (जल-थल-मल पुस्तक समीक्षा)

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खुले में शौच की आदत से निजात दिलाने के लिए केन्द्र सरकार शौचालय बनाने का काम 1980 के दशक से लेकर अब तक चलाती आ रही है। 1999 में इस अभियान का नाम टोटल सैनिटेशन कैंपेन और 2013 में निर्मल भारत अभियान हो गया। आज इसे स्वच्छ भारत अभियान के नाम से जाना जाता है। बदले नाम के साथ हाल में स्वच्छ भारत मिशन भी 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त कराने का बीड़ा उठाए हुए है। ऐसा करने वाले गाॅवों का निर्मल ग्राम पुरस्कार भी दिया जा रहा है। 2003 से लेकर अबतक करीब 28 हजार से ज्यादा गाॅवों को इस ईनाम से नवाजा जा चुका है।

सरकारी आॅकड़ो के मुताबिक देश में 10 में से 3 व्यक्ति आज भी खुले में ही शौच जाते हैं। जो सरकार के लिए अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी शर्मिंदगी का विषय है। सयुक्त राष्ट्र के अनुसार गरीबी में भारत से निचले पायदानों पर खडे़ देश नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि पडौसी मुल्क शौचालय बनाने में भारत से कहीं आगे निकल गए हैं।

केंद्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार इस अभियान के तहत अब तक 8 करोड़ 7 लाख शौचालय बनाए गए हैं। यानी 12 करोड़ 5 लाख शौचालयों के लक्ष्य का 70 फीसदी बन चुके हैं। परंतु 2011 की जनगणना के हिसाब से महज 5 करोड़ 16 लाख शौचालय ही पाए गए। मामला साफ है शौचालय ज़मी पर कम और कागज़ों में ज्यादा बने। 2008 के सर्वे में बड़ा खुलासा हुआ की 132 निर्मल गाॅव ईनाम पाने वाले में से केवल 6 गाॅव ऐसे निकले जिनमें कोई भी खुले में पखाना नहीं जाता था। योजना आयोग द्वारा तैयार 2013 की रपट इससे अधिक दिलचस्प है जो बताती है 73 फीसदी शौचालयवाले घरों में अब भी कम से कम एक सदस्य खुले में ही शौच जाता है।

इन सब के बीच प्रश्न उठता है, क्या शौचालय बनाना ही सैनिटेशन है और क्या मात्र शौचालय बनाने से ही भारत स्वच्छ हो जाएगा ? कहीं शौच मुक्त भारत के लक्ष्य का पीछा करते हम लोग प्राकृतिक संसाधनों का नाजायज दोहन और प्रदूषण तो नहीं कर रहे हैं ? मानव मल का प्रकृति और माटी से क्या संबंध है ? कहीं मात्र शौचालयी स्वच्छता के कारण ही तो पानी की बर्बादी और नदियों का प्रदूषण नहीं बढ़ रहा है? मल के जल और थल से बिखरे संबंधों से फिर रूबरू कराते हुए इन्हीं सब सवालों का जवाब तलाशती है, सोपान जोशी द्वारा लिखित जल-थल और मल पुस्तक!

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गाॅधी शाॅति प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित यह किताब आंरभ में हमें सृष्टि के मूल नियमों से अवगत कराती है, जिसमें जीव-जंतु मल-मूत्र जैसी बेकार समझी जाने वाली चीजों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं और पनपते है। आंरभिक प्राणियों ने जीवन काल के शुरू में कोशिकाओं से निकलने वाले कैल्सियम को भी बेकार नहीं गवाॅया और अपने हड्डी रूपी ढॅाचे, दाॅतो और नाखूनों को बनाने व बढ़ाने में लगाया। वास्तव में हर जीव का शरीर धरती के उर्वरकों का एक छोटा सा संग्रह ही है। घुम फिर कर ये उर्वरक फिर उसी स्थान पर पहुॅचते हैं जहाॅ से वे कभी निकले थे। पृथ्वी पर जीवन इसी लेन-देन से बना हुआ है। मल और मैले को साधन बनाने वाली यह जीवनलीला वर्षो से चली आ रही है। जो जीव इस पंरपरा का दायरा लांघ जाते हैं, वे समूल अपने ही कूड़े के ढे़र में दब कर मिट जाते हैं।

आगे पुस्तक बताती है कि पिछली कुछ शताब्दियों में वैज्ञानिक खोजों के बल पर हमने खूब भोजन उगाना व अनेक रोगों पर काबू पाना सीख लिया है। नतीजन हमारी आबादी चार गुना बढ़ कर 7 अरब से अधिक हो गई है। परंतु आबादी के अनुपात में हमारे मल-मूत्र के सुरक्षित निपटाने के साधन नहीं बढे हैं। 2013 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक ठीक-ठाक शौचालय तो दुनिया की कुल आबादी में से केवल 110 करोड़ लोगों के पास ही है। यानी 6 लोगों में से केवल एक के पास। आज भी गाॅव-देहात से लेकर भीड़ भरे बडे़ शहरों में बड़ी आबादी खुले में शौच जाती हैै। जिससे होने वाली बिमारियों पर दर्जनों शोध किए जा चुके हैं।

दूसरी ओर, आबादी का वो तबका भी है जो सीवर आधारित शौचालयों से जुड़ा है। जिसमें बेतहाशा पानी खर्च कर मल को जलस्रोतों में ही बहाया जा रहा है। चिंताजनक बात यह है कि सर्वेक्षणों के अनुसार सागर समेत दुनिया भर की आधे से ज्यादा नदियाॅ और तालाब सीवर के मैले पानी से दूषित है।

तीसरा पहलू यह है कि आज भी कानूनों के विपरीत मैला ढ़ोने की प्रथा बनी हुई जिसके चलते जाति विशेष के लोग दूसरों का मैला ढ़ोने को शापित है। इस कड़ी में सीवरों के मैले दलदल में घुसकर सफाई करने वाले गुमनाम लोगों की जमात भी जुड़ गई है, जिनके शोषण की चर्चा मानवाधिकारों की गलियारों से बाहर नहीं आई है। ये सफाई के सिपाही कई बार, सीवरों में जहरीली गैस के चलते मैले में ही दम तोड़ देते हैं।

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साथ में माटी और मल के संबंध को उजागर करते हुए, सोपान जोशी बताते हैं कि मानव मल में माटी के बेशकीमती उर्वरक है जिन्हें वापस माटी में जाना चाहिए। परंतु इन्हें निहायत बेकद्री से खूब साफ पानी के साथ नदियों में बहाया जा रहा है। और जिसकी भरपाई आजकल रसायनिक खादों से की जा रही है। जिससे हमारे खेत बंजर हो रहे हैं और हम खाद्यान्न संकट की कगार पर पहुॅच गए हैं। 10 अध्यायों के माध्यम से लेखक आपस में रहस्यमयी तरीके से उलझे, इन सभी मुद्दों की गहराई में गोता लगाकर, इनमें छुपी समानता को कुशलता से सतह पर ले आते हैं।

पुस्तक के उत्तरार्द्ध के अध्याय, शौचालय को शुचिता से जोड़ने वाली अनेक विधियों और समाधनों का विस्तृत चित्रण करती है। देश दुनिया में अनेक स्थानों पर शौचालय से निकले मल-मूत्र से खाद बनाने की कोशिशें हो रही है जिसके तहत कुदरती शौचालयों, ग्रीन टाॅयलेट आदि नए नमूने इजाद किए गए हैं। इसमें तमिलनाडू के ईको-सैन से लेकर पूर्वी कोलकता के मछवारों द्वारा मैले पानी से मछली पालन का नायाब उदाहारण शामिल है। कुछ कोशिशें उतनी सार्थक नहीं साबित हुई है।

किताब मेें एक अहम मसला भी उठाया है कि जल की कमी, नदियों के प्रदूषण, माटी की गुणवता और मैला ढ़ोने की प्रथा से जूड़े लोगों और संस्थाओं का आपस में गुफ्त्गू ना के बराबर है। इन विषयों पर काम करने वाले अलग अलग तरीके चुपचाप अपने मसलों के हल के लिए जद्दोजहद में लगे हुए हैं। जबकि ये मुद्दे आपस में जुडें है और वाॅछित नतीजों के लिए सबके सामूहिक और सांझा प्रयासों की सख्त दरकार है। अन्यथा ये समस्याएॅ विकराल हो जाएगी और मानव जाति भी प्रागैतिहासिक जीवाणु की तरह अपने ही मैल में दबकर नष्ट हो जाएगी।

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शुचिता और शौचालय निर्माण में मूल अंतर है। शुचिता के व्यापक अर्थ में मानव और घरों की स्वच्छता से लेकर नदी और खेती की स्वस्थ्ता भी मायने रखती है। शुचिता और शौचालय आधुनिकता और परंपरा का टकराव नहीं अपितु दोनों के मध्य सामाजस्य है। एंटी-बायोटिक दवाओं और सफाई में प्रयुक्त रसायनों से जीवाणु और रोगाणु में पनपी प्रतिरोधी शक्ति भविष्य में चिंता का सबब बनने जा रही है। शुचिता की परख असल में हमारा प्रकृति के साथ संबंधों की पड़ताल है। ईकोसैन शौचालय मनुष्य के शरीर को खेत से जोडता है। यह काम लद्दाख के छागरे भी करत हैं। डीवाटस् का तरीका हमें जल स्रोतों के विनाश के अधर्म से बचाता है। पूर्वी कोलकाता और मुदिअली के मछुआरों के परंपरागत तरीके से नई समस्या के मौलिक समाधान करत है।

प्रकृति में जीवन आगे बढ़ाने में मल-मूल की भी अहम भूमिका है। जीव-जतुं एक दुसरे के मल-मूत्र को उपयोग कर आगे बढ़ते हैं। केंचुआ माटी में रहकर, माटी खाकर, माटी में ही माटी का मल त्यागता है। दुधारू पशु खेत का घास खाकर, गोबर के रूप में खेत में वापस उर्वरक भेजते हैं। घरेलु पशु कुत्ता बिल्ली आदि माटी में अपने मल मूत्र को दबा देते हैं। जंगली जानवर अपनी रक्षा करने, अपना मौजूदगी जताने और अपने इलाके की सीमा तय करने में अपनी विष्ठा को बखूबी इस्तेमाल करते है। सागर में ब्लू व्हेल जैसे बडे़ जीव के मल का प्रयोग प्लवक करते हैं। इन प्लवकों पर तमाम मछलियों समेत क्रील भी पनपती हैं जो अंततः व्हेल का भोजन बनती है। बड़ी बिड़म्बना है कि आज हम खुद को अन्य जीवों और प्रकृति से अलग रखते हैं। मानव को छोड़कर प्रकृति के सभी जीव मल-मूत्र का बेहतर प्रबंधन जानते हैं। 

दरअसल हमारे मल में माटी की उर्वरता, वायुमंडल का नाईट्रोजन, पहाड़ो और भूतल का फास्फोरस, जीवाणुओं की जीवनलीला समाई है। कुछ पलों के लिए ही सही परंतु जल, थल व मल का निराकार होने वाला यह संबंध हमारे शरीर के नीचे एकदम साकार हो जाता है।

प्रकृति का नियम है जमीन से निकले उर्वरक वापस जमीन में जाने चाहिए। हमारे  मल-मूत्र में विष अमृत के गुण हैं यदि यह माटी में जाता है तो अमृत और यदि जल में गिरता है तो विष का रूप लेता है। शायद इसी लिए मानव समेत सभी जीवों के शरीर में मल और मूत्र निकालने के लिए अलग अंग बने हैं। ताकि जल-मल-मूत्र का संपर्क ना हो पाए परंतु आज हो ठीक इसके उल्ट रहा है। 

लेखक ने आंरभ में ही स्पष्ट कहा है कि केवल शौचालय का होना या ना होना इस किताब के लिखने का उद्देश्य नहीं है। वरन यह पानी माटी और मल के त्रिआयामी विचारों को जोडने का एक सेतु रूपी प्रयास है। पुस्तक में हिंदी भाषा में अब लगभग अप्रचलित होचुके शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। जैसे झंडाबरदार, पोथडे़, ढे़कली जो संदर्भ के अनुसार उपयुक्त है। परंतु आॅकड़ो, राशियों और वर्षो का उल्लेख शुद्ध हिन्दी के अंकों से छापा है जिसे समझने के लिए शायद पाठको के नए वर्ग को थोड़ी असहजता महसुस हो।

कुल मिलाकर जल थल मल पुस्तक अपने आप में अनुठा और तारीफेकाबिल प्रयास है जिसे समाज के सभी वर्गो को अवश्य पढ़ना चाहिए। शौचालयी स्वच्छता पर वैसे भी हिंदी भाषा में शायद ही कोई किताब लिखी हो। खास बात यह है कि जिस गहराई से सोपान जोशी जी ने गहन अध्ययन कर सभी मुद्दो को एक साथ जोड़ा है और सभी पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है वो दुर्लभ श्रेणी का कार्य है। एक वाक्य में कहें तो गागर में सागर है जल-थल-मल। यह पुस्तक आपका ज्ञानवर्धन करने के साथ साथ आपको शौचालयी स्वच्छता से उत्पन्न गंदगी और बदबू पर सोचने के लिए विवश करेगी।

सम्पूर्ण जानकारी और लेखन सामग्री विवरण के साथ पाठकगण इस किताब को  http://www.jalthalmal.in/  सुत्र के जरिए आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

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भीम सिंह रावत  SANDRP  (we4earth@gmail.com)

पुस्त़क का सारांश पढ़ने के लिए देखें – शौचालयी स्वच्छता से संपूर्ण शुचिता की ओर-2 (जल-थल-मल पुस्तक सारांश)

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