शौचालयी स्वच्छता से संपूर्ण शुचिता की ओर-2 (जल-थल-मल पुस्तक सारांश)

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आज गॉधी जंयती है और स्व्च्छ भारत अभियान को भी दो वर्ष पूरे हो गए हैं। दो दिन पूर्व, 30 सितम्बर को इंडोसैन समारोह का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने देश को स्वच्छ बनाने के लिए स्वच्छाग्रह चलाने का मंत्र किया है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत आयोजित इस समारोह में उन्होंने सीमित संदर्भ में ही सही दो ओर बड़ी अच्छी बातें कहीं, एक स्वच्छता को लेकर हमें अपने आचरण में बदलाव लाना चाहिए और दूसरा जैविक कूडे़ कचरे से खाद बनायी जा सकती है। दूसरी ओर शहरी विकास मंत्री वैंकया नायडू के अनुसार देश में 1 लाख से ज्यादा गॉव खुले में शौच से मुक्त हो गए हैं।

भारत के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने भी एक बार कहा था कि जब तक भारत में सब लोगों के पास शौचालय सुविधा उपलब्ध नहीं होती, वो तब तक भारत को आज़ाद नहीं मानेगे। इसी प्रंसग में राष्ट्रपिता महात्मा गॉधी जी का भी जिक्र अनायास हो आता है जिंहोने सैनिटेशन को आजादी से भी बढ़कर बताया और मैला प्रथा के विरोध में सब मानवों को अपने मैले का निपटान खुद करने के लिए भी कहा।

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इन सब के बीच प्रश्न उठता है, क्या शौचालय बनाना ही सैनिटेशन है और क्या मात्र शौचालय बनाने से ही भारत स्वच्छ हो जाएगा ? कहीं शौच मुक्त भारत के लक्ष्य का पीछा करते हम लोग प्राकृतिक संसाधनों का नाजायज दोहन और प्रदूषण तो नहीं कर रहे हैं ? मानव मल का प्रकृति और माटी से क्या संबंध है ? कहीं मात्र शौचालयी स्वच्छता के कारण ही तो पानी की बर्बादी और नदियों का प्रदूषण नहीं बढ़ रहा है? मल के जल और थल से बिखरे संबंधों से फिर रूबरू कराते हुए इन्हीं सब सवालों का जवाब तलाशती है, सोपान जोशी द्वारा लिखित जल-थल और मल पुस्तक!

संक्षिप्त समीक्षा के बाद इस लेख के माध्यम से किताब में सॉझा की गई कुछ अहम बातों पर जिक्र यहॉ पर दिया जा रहा है। सम्पूर्ण जानकारी और लेखन सामग्री विवरण के साथ पाठकगण इस किताब को  http://www.jalthalmal.in/ सुत्र के जरिए आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

स्वच्छ भारत या शौचालय बनाओ अभियान

केंद्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार इस अभियान के तहत अब तक 8 करोड़ 7 लाख शौचालय बनाए गए हैं। यानी 12 करोड़ 5 लाख शौचालयों के लक्ष्य का 70 फीसदी बन चुके हैं। परंतु 2011 की जनगणना के हिसाब से महज 5 करोड़ 16 लाख शौचालय ही पाए गए। मामला साफ है शौचालय ज़मी पर कम और कागज़ों में ज्यादा बने। 2008 के सर्वे में बड़ा खुलासा हुआ की 132 निर्मल गॉव ईनाम पाने वाले में से केवल 6 गॉव ऐसे निकले जिनमें कोई भी खुले में पखाना नहीं जाता था। योजना आयोग द्वारा तैयार 2013 की रपट इससे अधिक दिलचस्प है जो बताती है 73 फीसदी शौचालयवाले घरों में अब भी कम से कम एक सदस्य खुले में ही शौच जाता है।

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कई स्थानों पर अच्छे नतीजे भी आए हैं परंतु उन सभी में पहले समुदाय के साथ बैठकर समस्याओं पर चर्चा की गई और लोगों को शिक्षित, प्रेरित करके ही काम किया गया। परंतु ऐसे प्रयोग क्षेत्र विशेष तक ही सिमटे हुए हैं।

हालिया शोध पत्र बताते है कि दूरदराज के कई इलाकों में लोग शौचालय की जगह खुले में निपटना ही ज्यादा स्वच्छ मानते हैं। मतलब पखाना बनाना और उसे काम में लाना दोनों पूरी तरह से अलग बातें है। ऐसे तमाम उदाहरण हैं कि बुनियादी चीजों जैसे पानी, सफाई, दरवाजा आदि के अभावों में बने हुए शौचालय बेकार होकर लकडी रखने, भूसा भरने या बकरी बॉधने जैसे कामों में लाए जा रहे हैं।

फिर भी सरकार बिना आत्म चिंतन के इस अभियान को जोर शोर से बढ़ा रही है। कभी बिमारियों का डर दिखाकर से, तो कहीं महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा के नाम पर, कई जगह तो समुदायों को धिक्कार और घृणा के बल शौचालय बनाने को जरूरी मजबूरी बनाया जा रहा है। वो भी अहिंसा के पूजारी के चश्मे को इस अभियान का प्रतीक बनाकर।

भारतीय रेलवे और मानव मल की समस्या

शहरों में आबादी बढ़ने के साथ, खुले में शौच जाने के जमीन नहीं बची है। नतीजन शौचालय से वंचित जनसंख्या का एक बडा वर्ग रेलवे की जमीन खास तौर पर रेल की पटरियों पर ही मल त्याने पर मजबूर है। साथ में 42 हजार से अधिक डिब्बो वाली भारतीय रेले, रोजाना लाखों की संख्या में सवारियों को ढे़ाती है। हररोज़ बड़ी तादाद में मुसाफिर रेल के अदंर लगे शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं। जिनसे होकर मानव मल-मूत्र अनंतः रेल की पटरियों पर ही गिरता है। पटरियों पर गिरे मल से रोगों के अलावा रेल की पटरियों को भी खासा नुकसान पहुॅचता है। मल-मूत्र में मौजूद तेजाब से पटरियों के लोहे के गलने, पटरियों के जोड़ों के ढ़ीले होने की स्थिति में बड़े हादसे का खतरा हमेशा बना रहता है। नतीजन रेलवे को पटरियों की रखरखाव में अच्छी खासी धनराशि के साथ साथ सफाईकर्मियों की एक बड़ी फौज भी तैनात करनी पड़ती है। दशकों से ऐसा ही होता रहा।

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और अब जाकर, तमाम उॅहापोह के बाद भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की मदद से भी भारतीय रेलवे में फरवरी 2013 तक 10 हजार से अधिक डिब्बों में 32 हजार से अधिक बायो डाईजस्टर लगाए है। यह वैज्ञानिक संगठन दुर्गम बर्फीले इलाको में डटी सेना के लिए भी ऐसे बायोडाइजस्टर शौचालयों बनाता आ रहा है। इस शौचालय में मानव का मल जीवाणुओ के लिए भोजन बन जाता है जो इसे खाकर आबाद रहते हैं। अनुमान है कि देश की सभी गाडियों में बायोडाईजेस्टर लगाने में करीब 10 साल लग जाएगे और इसमें आज की कीमतों के हिसाब से खर्चा लगभग 2 हजार करोड़ आएगा।

शौचालय का इतिहास

शौचालय के अतीत के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। मल त्यागने के लिए दुनियाभर में अलग-अलग तौर तरीके चलन में बने हुए थे। बाईबल की ओल्टटैस्टामन्ट में घुमंतू लोग के लिए घर से दूर गड्ढे में हगकर माटी से ढॅकने की बात कही है। भारतीय ग्रथों में शौचालय के होने का जिक्र नहीं है। केवल मनुस्मृति में जल में मल का निष्कासन निषेद्य बताया गया है। चीन का ’बाहरीघर’ भी मल से खाद बनाने के सिद्धांत का पालन करता आया है। इंग्लैंड में सीवर व्यवस्था से पहले बडे़ गमलाकार मर्तबानों में मल करने के उदाहरण सुनने को मिले है। जिन्हें बाद में खेतों में खाली किया जाता था।

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16 सदी तक इंग्लैण्ड में फ्लश शौचालय आ गए थे। उस समय तमाम मैला पानी या तो थेम्स नदी में गिरता था या फिर गलियों अथवा सड़कों पर ही रेगंता था। गौरतलब है कि इसी नदी के उपरी हिस्से से शहर के पीने के पानी का बंदोबस्त भी होता था। शहर की आबादी तेजी से बढ़ी, साथ में शौचालय, नालियॉ, स्पटिक टैंक, जल जनित रोग, बदबू और थेम्स का प्रदूषण दिनोंदिन बढता गया। नतीजन 1848 तक थेम्स में गंदगी की इम्तहा हो गयी। और आवाम के साथ हुक्मरानों का जीना दुश्वार हो गया। नदी की संडाध से निजात पाने के लिए कई कोशिशे हुई पर एक भी काम ना आई। आखिकार बर्दाश्त से बाहर बदबू और गंदगी से छुटकारा पाने के लिए वहॉ की संसद के सामने से सीवर लाईन बिछाने का काम मंजूर हो गया।

सीवर प्रथा की शुरूआत और खामियॉ

18वीं शताब्दी में, रोगों पर हो रही खोज़ो और नए नगरों के गठन और भीड़ ने मल की निकासी शहर से बाहर करना वक्त का तकाजा बन गई। यूरोप के देशों में भारी भरकम खर्च पर सीवरों का जाल फैलने लगा। जिनको बनाने और चलाने के लिए नगर निकायों का गठन किया गया। यूरोपीय देशों में मैला सीवर लाईनों से बहकर जलस्रोतो में पहुॅचने लगा। विश्व शक्ति अमेरिका ने भी इसी पद्धित का अनुकरण किया। मजेदार बात यह थी कि भारी खर्च के चलते यूरोपीय देश, उपनिवेशी देशों में अपनी बस्तियों को छोड़कर अन्यत्र सीवर बिछाने से कतराते रहे।

19वीं शताब्दी में यूरोपीय और अन्य औद्योगिक देशों में आबादी बहुत बढ़ गयी। शहरों में भीड़ भड्डका होने लगा। मैले पानी की निकासी और साफ जल की पूर्ति के लिए सीवरों और पाईपों को बड़े पैमाने पर डाला गया। खूब जल दोहन हुआ और नदियों की गंदगी में भी बेतहाशा इजाफा हुआ। इस दौरान पानी साफ करने के उपकरण और मल शोधन कारखाने भी इन देशों में लगाए जाने लगे। साथ में, सीवर बिछाने की लागत कम करने के लिए सीवरों को बरसाती नालों और छोटी नदियों के साथ जोडा जाने लगा। नतीजन यूरोप और अमेरिका कि अनेक बरसाती बारामासी नदियॉ मैला ढ़ोने का जरिया मात्र बन गई। बरसाती नालों की तो ओर ज्यादा बेकद्री हुई जिन्हें ढककर पार्क, पार्किंग और बाजार बनाये गए।

ऐसी ही स्थिति के चलते दार्शनिक कार्लमार्क्स ने अपनी किताब कैपिटल में लिखा की मानव मल का खेती में बहुत महत्व है परंतु पूॅजीवादी व्यवस्था इसे जलस्रोतो में बहाकर दोहरा अपराध करती है वो भी बडी धनराशि खर्च करके।
आज पूरे विश्व में, सीवरों के जाल से पानी की खपत और प्रदूषण कई गुणा बढ़ गया है। मल के उर्वरक बर्बादी सो अलग। इटली का मिलान शहर हो या अमेरिका की राजधानी वांशिगटन, ब्रिटेन का लंदन हो या यूरोप में ब्रसेल्स, ये सारे शहर अपने आप में शक्ति, व्यापार, समृद्धि और कला की मिसाल है फिर भी इनको मल और मैला निपटान के लिहाज से आदर्श नहीं मान सकते है।

मल शोधन तकनीक की खामियॉ

लगभग 200 वर्ष पूर्व आरंभ हुई सीवर प्रणाली की 4 मुख्य खामियॉ आज भी जस की तस है। मसलन इनसे ताजे जल की बर्बादी बढती है। शौचालय बनाने, सीवर व्यवस्था डालने-चलाने और जलापूर्ति में अत्यधिक संसाधन लगते हैं, नदी-तालों का प्रदूषण बढता है और माटी की उपजाऊ ताकत खामखाह जाया जाती है।

पिछले सौ सालों में मैला पानी शोधन प्रणाली में भी बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है अपितु शोधन कारखानों में जटिलताएॅ बढ़ी है। नाली में मल के साथ बहने वाले ठोस कचरे से इन संयंत्रों की कार्यक्षमता पर निहायत बुरा असर पड़ा है। क्षमता से अधिक मैला पानी आने, इसमें तमाम तरह के विषलै रसायनों के होने से ये कारखाने बेअसर हो रहे हैं। जैसे-तैसे निकाले गए पानी को उपयोग में लाने के उदाहरण कम ही है। व अमूमन कारखाने से निकले पानी का फिर से नालों में बहा दिया जाता है। अक्सर कारखानें बिजली के अभाव में बंद पडे रहते हैं। संचालन में विभागीय लापरवाही और ठेकेदारों के मुनाफाखोर होने का खामियाजा भी इन कारखानों के बेकार होने के तौर पर सबके सामने है। इसमें मैले को सुखाकर बनाई खाद जिसे स्लज कहते है के इस्तेमाल पर भी दुनियाभर में अलग अलग मत है। फसलों और जीवाणु पर इसके नतीजों की अभी पूरी जानकारी नहीं है। कुछ शोधों में स्लज में मौजूद जहर के टूटने तो कुद परीक्षणों में पौधों में विषैले तत्वों के बढने की बात सामने आई है। स्लज में कई ऐसे मुर्दा या अधमरे रोगाणु भी होते हैं जो मिट्टी के संपर्क में आने पर फिर से जी उठते हैं।

अब अक्लमंदों की एक बडी जमात मान रही है कि सीवर प्रणाली मूलतः खामियों से भरी है। सीवर लाईन बिछाने से लेकर, मैले पानी को कारखानों तक पहुॅचाना जटिल और खर्चीली व्यवस्था है जिसमें कारखाना चलाने की लागत का 70 प्रतिशत पैसा लग जाता है। इस व्यवस्था में पानी बहुत लगता है। नए कारखानों के लिए लंबी चौड़ी जमीन भी चाहिए। इन दोनों संसाधनों का शहरों में नितांत अभाव है। कारखाने में चारों पहर बिजली की आपूर्ति और कुशल कारीगरों की मौजूदगी भी एक समस्या है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि चाहे आधुनिक शहर के ढांचे में सीवर व्यवस्था एक अहम जरूरत है पर मल-मूत्र हटाने का यह तरीका बेहद अस्वाभाविक है। जितना ज्यादा मैला पानी जमा होता है, उतना ही ज्यादा उसे साफ करने का खर्चा बढ़ जाता है। अतः मैले पानी को उदगम के पास ही शोधित करना ज्यादा उचित और सुरक्षित है।

मैले पानी का साफ सच

विकास की धुन में मगन हमारी सरकार को अभी तक नहीं पता कि हमारे शहर कुल कितना ताजा जल उपयोग करते हैं और बदले में कितना मैला पानी पैदा करते हैं। सरकारी आकॅडे अधिकतर जल बोर्डो और नगरपालिकाओं की आपूर्ति पर आधारित होते हैं जिसमें अवैध भूजल की खपत का कोई लेखा-जोखा नहीं होता है। वास्तव में आज हमारे ज्यादातर चमकदार शहरों की नींव निजी तौर पर हो रहे भूजल दोहन पर ही टिकी है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 2015 के अध्ययन की रपट के हिसाब से देश में मौजूद कुल 816 मल शोधन कारखानों में से केवल 522 कारखाने चालू हालत में है शेष या तो बंद हैं, या फिर बन रहे हैं या प्रस्तावित है। और चालू संयंत्रो में 1888 करोड़ लीटर मैला ही साफ किया जा सकता है। जबकि हमारे शहरों में 3200 करोड़ लीटर मैला पानी निकल रहा है। अगर सभी 816 कारखाने चालू भी हो तो भी ये इनकी मल शोधन क्षमता 2327 करोड़ लीटर प्रतिदिन से ज्यादा की नहीं है।

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उधर केंद्रीय शहरी विकास बोर्ड के पास कोई अनुमान नहीं है कि सयंत्रों को दुरूस्त रखने और शहरों में सीवर तंत्र पूरा करने पर कितनी धन राशि लगेगी। एक अंदाजा के अनुसार इस काम में डेढ़ लाख करोड़ रूपए का खर्च आ सकता है। क्या भारत सरकार इतना पैसा खर्च कर पाएगी ? और अगर खर्च करके मल शोधन कारखाने बना भी देती है तो क्या कंगाल नगर पालिकाएॅ इनको चला पाएगी? क्या शहरी नागरिक कभी भी अपना मैला साफ करने की थोड़ी भी कीमत चुकाएॅगे?

सन 2005 में केंद्रीय शहरी विकारी मंत्रालय के अध्ययन अनुसार भारत के 301 शहरों में मैले पानी निकासी प्रणाली में गंभीर खामियॉ हैं। 701 पन्नों की रपट, सर्वेक्षण किए गए 301 शहरों में से केवल 100 में सीवर तंत्र पाया गया। रपट आगे बताती है इन 100 शहरों में भी 55 फीसदी से अधिक आबादी सीवर व्यवस्था से जुडी नहीं है। 2011 में ऐसे ही एक अलग मुआयने में पाया गया कि 5161 शहरों में से मात्र 300 में सीवर लाइन है। और केवल 40 फीसदी आबादी ही इस तंत्र से जुड़ी हैं। रपट बताती है कि हैदराबाद और बेंगलुरू जैसे महानगरों में भी आधा अधूरा सीवर जाल ही बिछाया है। बाकी शहरों की हालात का अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है।

रपट आगे बताती है कि शिमला में भी 2011 के अनुसार 71 प्रतिशत भाग में सीवर लाइन बिछ चुकी थी परंतु 40 हजार घरों में से मात्र 12 हजार पॉच सौ घर ही सीवर तंत्र से जुडे थे। सन 2007 से ही शिमला में पीलिया का प्रकोप है। वर्ष 2016 में ही इस रोग से 1500 ज्यादा लोग पीड़ित हुए हैं और 7 लोगों की मौत भी हुई है। जॉच में पाया गया कि शिमला के ही एक मल शोधन कारखाने का दूषित जल पानी की आपूर्ति में मिल रहा था।

हमारे शहरों से गंदे पानी की निकासी और ताजे जल की आपूर्ति का काम अमूमन एक ही महकमा करता है। जिनके तमाम संसाधन ताजे जल आपूर्ति में ही लग जाते हैं और इनके पास दूषित जल के निकास और निपटान का कोई चारा नहीं बचता है सिवाय उसे राम भरोसे छोडने के। नगर निकायों के ’दिवालियापन’ का फायदा पीने का पानी साफ करने की मशीन बनाने वालों ने भरपूर उठाया है जिसके चलते ऐसी मशीनों का बाजार 2013 तक 3200 करोड रूपए हो गया है। साथ में पेयजल बोलतों का व्यापार भी सालाना 10 हजार करोड रूपए हो गया है। पानी के बढते बाजार से जलस्रोतों के दोहन और शोषण की बात जगजाहिर है। इसके अलावा, नगर निकाय जितना अधिक आपूर्ति बढाते हैं, मैले पानी की मात्रा भी उतनी अधिक बढ़ जाती है।

जिस बेतकलीफी से हम फट से शौचालय में खूब पानी डालकर अपना मल बहाते हैं, उसकी कीमत का अहसास पानी की लंबी कतारों को देखकर सहज हो जाता है। हमारे मल को मोटरों द्वारा ढ़ाल के उल्ट चलाने, नालियों एवं मल-जल शोधन कारखानों को बनाने एवं रखरखाव में भारी भरकम धनराशि खर्च होती है, इस सबके बावजूद यह गंदगी आखिरकार हमारी नदियों व तालाबों में ही जाती है। पर हम इन सब खर्चो और मुद्दों के बारे में वैसे ही भूल जाते हैं जैसे, शौचालय में अपने मल को बहाकर।

गौरतलब है कि सीवर में बहने वाला लगभग 99 प्रतिशत भाग पानी ही होता है, मैला पानी। जितना पानी घरों में जाता है उसक 80 फीसदी दूषित होकर बाहर निकल जाता है। साथ में घरों में कुल जल का मात्र 10 प्रतिशत ही पीने और खाने बनाने के काम में लाया जाता है। शेष साफ सफाई के जिसका बड़ा भाग शौचालय में मल का बहाने मे लगाया जाता है।

भूजल एवं सतही जल के बढ़ती बर्बादी के पीछे हमारे शहरों की प्रंबधन व्यवस्था में घोर खामियॉ उजागर करती है। आज ये शहर अपने जल स्रोतो तालाबों, नदियों को तो चौपट करते जा रहे हैं और अपनी अनावश्यक जरूरतों के लिए दूर दराज के क्षेत्रों का पानी लूटने पर आमदा हैं। भाखड़ा व टिहरी बॉध भी देश की राजधानी दिल्ली की प्यास नहीं बुझा पाए और अब रेनूका बॉध बनाने की तैयारी चल रही है।

खतरों से घिरी मल-जल शोधन व्यवस्था

पीने के पानी से सभी रोगाणुओं को हटाना खासा मुश्किल है। अमूमन इसके लिए क्लोरीन नाम के एक विषैले रसायन का हरकहीं इस्तेमाल होता है। जिसका विश्वयुद्धों के दौरान जानलेवा हथियार के तौर पर जमकर प्रयोग हुआ। वैज्ञानिकों को मानना है कि इस रसायन के अधिक प्रयोग से शरीर के अंगों पर बुरा असर पड़ता है तब भी तमाम विरोधों के बावजूद, क्लोरीन से इतर हमारे पास पानी साफ करने का कोई चारा नहीं है। क्योंकि पानी में यह रसायन रोगाणुओं को मिटाने में बेहद असरदार रहा है। फिर भी बुद्धिजीवी वर्ग क्लोरीन के विकल्प खोजने की लंबे अरसे से हिदायत दे रहा है।

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हमारे मैले से होकर जीव विरोधी एंटीबॉयोटिक दवाओं के अंश भी जल-मल शोधन कारखानों में पहुॅच जाते हैं। जहॉ ये दुसरे जीवाणुओं के साथ मिलकर नए खतरनाक और ताकतवर रोगाणुओं को पैदा करते हैं जिन्हें सुपरबग के नाम से जाना जा रहा है। इस तरह मलशोधन कारखाने, महाबलवान रोगाणुओं को तैयार करने का गढ़ भी बन रहे हैं। जहॉ एक रोगाणु से दूसरे रोगाणु को बड़ी आसानी से सीधे ताकत मिल जाती है। जिससे, सेहत जगत की नई प्रभावशाली एंटी-बायोटिक खोजने पर कि गई करोड़ो रूपए की योजना और उसके परिणाम यहॉ धराशायी हो जाती हैं।

बेंगलुरू में सीवर लाइन के अभाव में बडे़ पैमाने पर सैप्टिक टैंक आधारित शौचालय बने हैं जिनका मैला पानी पिटसकर ट्रकों के माध्यम से किसानों के खेतो में डाला जाता है। कई ऐसी गाडियॉ खुले या जल स्रातों में भी उडे़ली जाती है। कुछ किसान संभ्रात रिहायशी इलाकों से निकला मैला पानी इसलिए नहीं लेते क्योंकि उनमें विषैले तत्वों की मात्रा अधिक होती है। सूचनाक्रांति के दूत इस शहर में कम्पूयटर पर एक क्लिक पर सभी जानकारी मिल जाती है बशर्ते आप साफ पानी की खपत और कुल मैले पानी की मात्रा ना तलाश रहे हो।

सीवर के अभाव में मल को गड्ढे में जमा रखने से भूजल प्रदूषण की समस्या भी सामने आई है। सरकारी परीक्षणों के हिसाब से हर बड़े शहर में मल से आने वाले नाईट्रेट बैक्टिरिया की मात्रा मैले पानी के लिए तय हुई सीमा से कहीं ज्यादा है। भारत में जल प्रदूषण को यूनिसेफ 2013 की रपट में ’टाईम बम’ बताया गया है।

मैला ढ़ोना और सीवर खोलना, कितना अंतर?

मैला ढ़ोने का काम समयांतर में जाति विशेष के लोगों पर थोप दिया गया है। इस वर्ग का शासकों और समाज के दूसरे उच्च वर्गो ने शोषण ही किया है। मैला ढ़ोने की प्रथा तो निंदनीय है परंतु मल से अटे पडे सीवरों में गर्दन तक धॅसकर साफ करते सफाईकर्मी का नारकीय जीवन क्या कम निंदनीय है। हरसाल कई सफाईकर्मी सीवर में मल से बनी जहरीली गैस के कारण सीवर के अंदर मल में ही अपनी जान गॅवा देते हैं। ये मजदूर नगर निकायों में पक्के भी नहीं होते हैं, परंतु ठेकेदार द्वारा रोजना की दिहाड़ी पर नाली खोलने का काम करते हैं।

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दूसरी ओर, संसद 1993 में मैला ढ़ोने की प्रथा के निवारण के लिए सुखे शौचालयों के निर्माण को बंद कर रही है। फिर 2013 तक देश में 26 लाख सुखे शौचालयो होने की बात सामने आई है। मामले में हस्तक्षेप करते हुए, संसद ने 2013 में सुखे शौचालयों को सीवर से जोड़ने की बात कही है। परंतु त्रासदी देखिए कि जाम होने की स्थिति, फिर से किसी गरीब मजदूर को तमाम नियमों को ठेंगा दिखाते हुए, सीवर में उतारा जाता है। जहॉ वह दूसरों के मल में पूरा डूबा रहता है। भारतीय रेलवे तो खुलेआम मैला ढ़ोने की प्रथा रोकने के लिए बनाए कानून को आए दिन तोड़ रहा है।

वहीं आज भी मैला ढ़ोने की प्रथा के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले तथा शौचालयों पर काम करने वाली संस्थाएॅ अलग अलग होकर चल रही है। ससंद के कानूनों और उच्च न्यायालय के फरमानों के बावजूद भी मैला ढ़ोने वाला समाज और सीवर सफाईकर्मचारी बदहाल और पीड़ित है। जिनकी सफाई के मंदिर में दिनदहाडें़ बलि दी जा रही है। बेहतर है हम समझे कि केवल शौचालय और सीवर की नालियॉ बनाने से ही भारत स्वच्छ नहीं बनेगा।

सैनिटेशन, शौचालय और शुचिता

अग्रेजी के शब्द सैनिटेशन का मतलब ही जल-मल आरोग्यता होता है। इसी के इर्द-गिर्द शौचालय निर्माण का सारा ताना-बाना बुना जा रहा है। हिंदी में उसके स्थान पर प्रयोग शब्द शौचालय का अर्थ केवल मल निपटान का साधन मात्र है। सरकारी अभियानों में भी, बस खुले में न जाकर येन केन प्रकरेण, अवैज्ञानिक, प्रदूषणकारी, बदबूदार कोठरियों में, खूब पानी से मल को बहाना ही स्वच्छ भारत मिशन का पर्याय बन गया है। इससे इतर शौचालय की जगह शुचिता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। शौचालय जहॉ मल से छुटकारे तक सीमित है। शुचिता में तन-मन और प्रकृति की स्वच्छता भी शामिल है।

परंतु आधुनिक शौचालय की सुविधा की यह एक बड़ी दुविधा है। सब जगह सीवर आधारित शौचालयों का निर्माण ही सरकार का लक्ष्य है। सरकारी योजनाओं और समाज की मानसिकता पर सीवर आधारित शौचालय व्यवस्था हावी हो चुकी है। इसीलिए लबें अरसे में इसकी खामियों से हम जानते-बूझते अंजान बन बैठे हैं। हम जल प्रदूषण को तो देख रहे है पर अपना व्यवहार नहीं बदल पा रहे हैं।

शुचिता के नाते सीवर की प्रणाली अधूरी और अधकचरी है। परंतु आज नल में साफ पानी और चमचमाता शौचघर ही हमारे आदर्श हैं। हमारी नदियों की सेहत मायने नहीं रखती है। सब घर घर पानी पहुॅचाने औच शौचघर बनाने की बात करते हैं परंतु नजरअंदाज करते हैं कि जब पानी भरने और शौच करने घर से बाहर जाते थे तब हमारी नदियॉ और तालाब साफ थे।

सीवर और शौचालयों के विकल्प

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प्रकृति का नियम है जमीन से निकले उर्वरक वापस जमीन में जाने चाहिए। हमारा मल-मूत्र में विष अमृत के गुण हैं यदि यह माटी में जाता है तो अमृत और यदि जल में गिरता है तो विष का रूप लेता है। शायद इसी लिए मानव समेत सभी जीवों के शरीर में मल और मूत्र निकालने के लिए अलग अंग बने हैं। ताकि जल-मल-मूत्र का संपर्क ना हो पाए परंतु आज हो ठीक इसके उल्ट रहा है। मानव मल मूत्र का अलग रखने की तर्ज पर तमिलनाडू में स्कोप द्वारा निर्मित ईको-सैन शोचालयों में मल-मूत्र इक्कठा कर खेती में प्रयोग करने के उत्साहजनक नतीजे सामने आए हैं। बेगलुरू में अर्घ्यम संस्था ने एक स्कूल में मूत्र जमा कर उर्वरक बनाने की पहल की है। एक अनुमान है कि भारत की आबादी के मल-मूत्र से हर साल में 78 लाख टन नाईट्रोजन, पोटेशियम और फासफोरस मिल सकता है। जिससे माटी की लुप्त होती ताकत फिर से बहाल कर सकती है।।

कोलकाता में मुदिअली के मछुआरे बेहद सटीक और परंपरागत ज्ञान के प्रयोग से शहर से निकले सारे मैले पानी का उपचार कर उसमें मछली पैदा करते है। ऐसा अद्भूत काम बरसों से हो रहा है जिससे वहॉ एक अच्छा खासा मावन जनित पारिस्थितीय तंत्र फल-फूल रहा है। विश्व में यह प्रयोग अनोखा है जिससे काफी कुछ सीखा जा सकता है। सरकार को मैले पानी की सफाई पर कोई खर्चा नहीं करना पड़ता ना ही कारखाना लगाना पड़ता है। फिर भी यहॉ, शहरीकरण के दबाव के चलते मछुआरों की भेरियों की जमीन पर खतरा मंडरा रहा है।

बेंगलुरू में सीडीडी नामक संस्था ने विकेंद्रीकृत मैला पानी सफाई व्यवस्था योजना (डीवाटस्) के तहत 150 से अधिक स्थानों पर छोटे परंपरागत औ प्रकृति आधारित तरीकों से मैला पानी साफ करने का संयंत्र लगा चुकी है। अग्रेंजी में डीवाटास् नाम से मशहूर इस नमूने के अधिकतर परिणाम सकारात्मक निकले हैं। देश के अन्य भागों में भी वैज्ञानिक लोग और कुछ कंपनियॉ ऐसी ही कोशिशें कर रही है। जापान में जो भवन और इमारते सीवर से नहीं जुडी होती है, उनके नीचे जोकासो नाम की मशीन लगाई जाती है जो मैले पानी को साफ करती है जिससे जल प्रदूषण नहीं होता है।

हमारे यहॉ आज भी ऐसे गॉव है जहॉ खैनी, बीड़ी का लालच देकर औरों को अपने खेत में मल करने को कहा जाता है। लद्दाख में लोग दोतलों से बने छागरा नामक शौचालय में मल से खाद बनाते आ रहे हैं। महाराष्ट्र के कई भागों में तो मल से बने खाद को सोनखत की संज्ञा दी गई है। ग्रामीणऑचंल में बड़ों बूढ़ों के दिशा मैदान जाने के समय खुरपी साथ रखने और निवृत होने के बाद मल को माटी से ढॅकने के आज भी कई किस्से सुनने को मिलते हैं। उत्तरप्रदेश में शामली जिले के किसान, दो दशक पूर्व गोबर की भॉति रोजाना मानव मल को जमा कर खेतों में डालने की बात सहजता से बताते हैं।

2003 में चीन के ओरदोस शहर में बहुमंजिला इमारतों में कुदरती शौचालय बनाए गए। परंतु ये प्रयोग असफल रहा क्योंकि भवनों में रहने वाले निवासियों को इस योजना से अवगत नहीं कराया गया था। समाज की जागरूकता और अभाव के चलते भारत में भी एकाध जगह ऐसे प्रयोग असफल हुए हैं।

जाहिर है किसी एक प्रकार के ही वैक्लपिक शौचालय और मल शोधन के तरीके सभी जगह नहीं अपनाए जा सकते है। मल त्यागने के बाद मिट्टी से दबाने से लेकर, कोलकाता की भेरियों जैसी व्यवस्था और बेंगलुरू में चल रही विक्रेंद्रीकृत मैला शोधन पद्धति जैसे तमाम विक्लप मौजूद है। ये उपाय एक दूसरे से अलग और क्षेत्र विशेष तक सीमित हैं। ऐसे ही नए समाधानों पर ओर काम किया जा सकता है।

प्रकृति जीवन आगे बढ़ाने में मल-मूल की भी अहम भूमिका है। जीव-जतुं एक दुसरे के मल-मूत्र को उपयोग कर आगे बढ़ते हैं। सागर में ब्लू व्हेल जैसे बडे़ जीव के मल का प्रयोग प्लवक करते हैं। इन प्लवकों पर तमाम मछलियों समेत क्रील भी पनपती हैं जो अंततः व्हेल का भोजन बनती है। बड़ी बिड़म्बना है कि आज हम खुद को अन्य जीवों और प्रकृति से अलग रखते हैं।

पूतले हम माटी के

आदमी शब्द यहूदी भाषा के आदमा से बना है जिसक अर्थ माटी होता है। अग्रेंजी भाषा के ह्यूमन शब्द का जन्म भी ह्मस से है जिसका मतलब माटी में मौजूद कार्बनिक तत्व है। वास्तव में हम माटी के ही पुतले हैं। लेकिन आज हमने अपने शरीर को जहीरले रसायनों की शरणस्थली बना लिया है। साथ में हमारे घरों में भी बडे़ पैमाने पर सफाई करने के लिए विषैले रसायनों उपयोग किए जाते हैं।

आज जीवाणुओं बैक्टीरिया का डर दिखाकर दवाओं और रसायनों का एक विशाल बाजार खड़ा हो गया है। मल से फैलने वाले पीलिया, हैजा जैसे अनेक रोगों का इलाज खोजा जा चुका है। परंतु फिर भी विकासशील एंव गरीब देशों में हर साल 22 लाख बच्चे पेचिश के कारण मर जाते है। जिसका कारण मैले पानी का समुचित प्रबंध ना करना है। साफ सुथरे विकसित देशों में भी संक्रामक रोग फैलते हैं। तमाम खोजों और खर्चो के बाद भी क्यों हम इन रोगों पर काबू नहीं पा सके हैं। क्यों रोगाणु हमारा पीछा नहीं छोड़ रहे है?

इसके कई कारण हैं। हम अपने स्वभाव और कुदरत के नियम को ठीक से नहीं समझते हैं। साथ में हमारी कीटाणुओं के बारे में भी एकतरफा जानकारी है। पुराने समय से ही रोगों के निदान के लिए उसी रोग के संक्रमण से टीके बनाए जाते है। भारत, चीन तुर्की, युनान आदि देशों में लोग ऐसी जानकारी रखते थे। मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता से आसान रोगाणुओं पर परीक्षण का कार्य था। एंटीबायोटिक आने के बावजूद रोगाणुओं ने बढ़ना बंद नहीं कि अपितु इन दवाओं की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ानी शुरू की। नतीजन 2015 में बड़ी मुश्किल से पिछले 28 सालों में एक ही एंटीबायोटिक ईजाद हो पाया है। वैज्ञानिकों को मानना है एंटीबायोटिक अब बेअसर हो रही हैं और अब हम उत्तर-एंटीबायोटिक युग में आ चुके हैं।

हमारी चिकित्सा में सेहतमंदी की रक्षा पर उतना मुनाफा नहीं होता जितना रोगों का मंहगा ईलाज ढूढॅने में होता है। इस कारण जीवाणुओं का हौवा बन गया है। इनको खतरनाक आंतकवादी संगठनों की तरह घोषित किया गया है जो हमारे लिए मुसीबत और समस्या हैं।

सच तो ये है कि हमारे शरीर में दस लाख करोड़ जीवाणु हमेशा रहते हैं। जिनमें रोगाणु भी होते हैं जिनको शरीर की रक्षा प्रणाली जीवाणुओं के साथ मिलकर काबू में रखती है। जीवाणु और रागाणुओं की बीच लेन देन भी है जिससे हमारे शरीर के लाभ भी मिलता है। जिसकी जीवन को चलाने में अहम भूमिका है। जिसे अब विज्ञान भी मानने लगा है।

वास्तव में जीवाणुओं के बिना पृथ्वी पर जीवन चल ही नहीं सकता है। पौधों को भी माटी से पोषणता पाने के लिए जीवाणु की मदद चाहिए होती है। मृत जीव जंतु और पौधे अंत में सडकर जीवाणुओं का ही भोजन बनते हैं। कोलाइटिस नामक बीमारी के इलाज के लिए तो स्वस्थ मानव मल का अंश रोगी की निचली ऑतों में डाला जाता है। जीवन की मूल ईकाई में यहीं जीवाणु ही है। हमसे पहले ये दुनिया इंन्ही की थी और हमारे बाद भी ये बने रहेंगे।

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प्रकृति के सभी जीव मल-मूत्र का बेहतर प्रबंधन जानते हैं। केंचुआ माटी में रहकर, माटी खाकर, माटी में ही माटी का मल त्यागता है। दुधारू पशु खेत का घास खाकर, गोबर के रूप में खेत में वापस उर्वरक भेजते हैं। घरेलु पशु कुत्ता बिल्ली आदि माटी में अपने मल मूत्र को दबा देते हैं। जंगली जानवर अपनी रक्षा करने, अपना मौजूदगी जताने और अपने इलाके की सीमा तय करने में अपनी विष्ठा को बखूबी इस्तेमाल करते है।

हिंदुओं के लिए गाय के मल-मूत्र की विशेष महिमा है जिसे अमृत तुल्य बताया गया है। घर का चुल्हा लिपने से लेकर, त्यौहारों, शुभकार्यों में गाय के गोबर का निसंकोच प्रयोग होता है। उत्तर भारत में पशुओं के गोबर से उपले-कंडे बना उसमें भोजन पकाया जाता है। उष्मा के लिए ईधन बनाया जाता है। मनुष्य तो सर्वोतम अन्न खाता है फिर क्या उसका मल जल की बर्बादी और नदियों के पदूषण के लिए बना है? क्या मनुष्य का मल खाद बनकर वापस अपने स्रोत माटी में नहीं जा सकता है?

जीवाणुओं से मानव शरीर और सेहत का वास्ता जानने के लिए अमेरिका और जर्मनी में बडे़ स्तर पर शोध कार्य चल रहा है। जीवाणुओ की वजह से ही हमारी आंते भोजन का पाचन कर पाती हैं। इस तर्ज पर प्रोबायोटिक दूध उत्पाद भी आजकल बाजार में खुब मुनाफा कमा रहा है। सृष्टि का नियम है जो पोषकता माटी से होते हुए पौधो के माध्यम से मानव के पेट में जाती है वो फिर से मल-मूत्र के रूप में माटी में वापस आए। परंतु ऐसा नहीं होता ये सब सीवरों नालियों के माध्यम से नदियों और पानी के कुड़ो में जा रही है।

सीवरों में मानव मल के साथ एंटीबायोटिक एवं विषलै रसायनों का भी को भी बहाया जाता है। इस नए माहौल में जिंदा रहने के लिए मल में मौजूद जीवाणु अपनी प्रतिरोध क्षमता को बढ़ाते हैं जो अंततः सुपरबग या महाबली जीवाणुओं को जंम देती है।

हमारे घरों में आज भी पश्चिमी देशों में प्रतिबंधित ट्राक्लोसैन से बने सफाई उत्पाद धडल्ले से प्रयोग होते हैं। इसका प्रयोग दंतमंजन बनाने से लेकर शौचालय साफ करने के लिए बनाए रसायनों में होता है। इस रसायन के स्वास्थ्य पर हो रहे विपरीत असर पर अनेक सवाल उठ रहे हैं

विज्ञान अब बता रहा है सूरज की रोशनी से बड़ा रोगाणुनाशक कोई नहीं है और हममें से सबका शरीर एक प्रकार का ग्रह ही जिस पर करोड़ो प्राणी पनपते हैं। कीटाणु से घृणा और स्वच्छता की अतिवादी आज अनेक बीमारियों का कारण बन रही है।

कृत्रिम उर्वरकों की बनावटी जरूरत

लंबे समय से ही खेती में पोषक तत्वों की कमी पूरी करने के लिए मनुष्यों और पशुओं के मल को खाद के तौर पर प्रयोग होता रहा है। भारत में पशुओं के साथ घुमने वाली बंजारों की टोली को भी किसान खाद के लिए खाली खेतों में पशु चराने और बैठाने के लिए नकद पैसा देते थे। 1908 में शंघाई शहर में एक ठेकेदार ने 31 हजार डॉलर मूल्य के सोने के सिक्के देकर शहर से 78 हजार टन मल-मूत्र एकत्र करने के अधिकार ले लिए। जिसे वह आस पास के इलाकों में खाद के तौर पर बेचता था। अतीत में चीन में सुखे शौचालय थे जिनमें मल से खाद बनाकर खेतों में डाला जाता था।

सागरों में कम बारिश वाले द्वीपों पर पक्षियों की बीट के पहाड़ाकार ढे़र लग जाते थे। इसे गुआनों कहते थे। यह बेशकीमती खाद है। जिसमें नाईट्रोजन और अन्य उर्वरक प्रचूर मात्रा में मिलते थे। दक्षिण अमेरिका के प्रशांत महासागर पर बने द्वीपों पर गुआनों के बड़े भंडार थे। 1500 साल पहले जिसे यूरोपीय देश इसे बडे़ बडे जहाजों में लादकर लाते थे। इस खाद के लिए देशों के बीच युद्ध भी लडे़ गए। इंका साम्राज्य में इस दर्जा सोने के बराबर था। जेम्स बॉन्ड कड़ी की प्रथम फिल्म डॉक्टर नो का खलनायक गुआनो ही का व्यापार करता था।

परंतु आज ये संबंध खत्म होते जा रहे हैं। किसान पूरी तरह उर्वरकों पर आश्रित हैं। खेती की लागत बढ़ गई है। उत्तम खेती का मंत्र देने वाले देश में खेती घाटे को सौदा बन गई है। किसानों की खुदकुशी आम बात हो गई है। नई पीढ़ी खेती से मुॅह फेर रही है। वैज्ञानिक मान रहे हैं कि कृषि विज्ञान अब किसानों के काम का नहीं है। खेती की सारी पढ़ाई नए रसायन बनाने और बेचने पर आधारित हो गई है। सरकार अनुदान के बोझ को चाहकर भी कम या हटा नहीं पा रही है। सबके सब नाईट्रोजन से यूरिया के बनाने के की तरह के किसी चमत्कार जैसे किसी का इंतजार कर रहे हैं। इसे विज्ञान पर अंधविश्वास नहीं तो क्या कहा जाए।

सन् 1908 के बाद हवा में मौजूद नाईट्रोजन से अमोनिया बनाने की खोज हुई। जिसका विस्फोटक के तौर पर विश्वयुद्धों में जमकर इस्तेमाल किया गया। युद्धों के बाद कारखानों में रखे अमोनिया के भंड़ार को बेकार होने से बचाने के लिए इससे यूरिया बनाना शुरू किया गया।

19 सदी में, एशिया और अफ्रीका के देशों में इस यूरिया को बड़े पैमाने पर बेचा जाने लगा। आज इन देशों में किसानों के साथ माटी भी यूरिया की आदी हो चुकी है। और सरकार को भारी भरकम छुट देकर, दूसरे देशों आयात कर किस तरह इनकी आपूर्ति करनी पडती है जिससे सरकार को हर साल भारी आर्थिक घाटा होता है। वर्ष 2015-16 में उर्वरकों पर सरकार को 72 हजार करोड़ की अनुदान देना पड़ा।

बनावटी खादों से मृदा की सेहत पर हो रहे विपरीत असर सामने आ रहे हैं। साथ में, ये रसायन बारिश में बहकर जल स्रोतो को भी प्रदूषित कर रहे है। कृत्रिम खादों की पैरवी करने वाली सरकार अब किसानों को इन खादों पर आश्रिता कम करने और इनका कम उपयोग करने के लिए आगाह कर रही है।

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वास्तव में सीवर में मानव मल के माध्यम से उर्वरकों की बर्बादी हो रही हें 19 शताब्दी में लंदन में सीवरों से व्यर्थ जाने वाले रसायनों की कीमत उस वक्त 40 लाख पौंड़ ऑकी गई थी। क्या आज की सीवर आधारित शौचालय व्यवस्था खेती को बंजर करने का अधिकार तो नहीं बन गई है।

शौचालय में फट से पानी से मल-मूत्र बहाने वाले लोगों को अपनी नदियों और तालाबो का प्रदूषण करते हैं। साथ में सीवर में गोता लगाने वाले मजदूरों के साथ होने वाले अन्याय का कारण बनते हैं। जिसे हम स्वच्छता मान बैठे हैं उसमें अनैतिकता का घोर मैला मिला हुआ है। स्वच्छता के नाम पर तो बहुत से लोग जमा हो रहे हैं लेकिन मैला ढ़ोने वाले लोगों के हक में आवाज़ उठाने वाले गिने चुने ही हैं।

शौचालय निर्माण और शुचिता में अंतर

शहरों की सफाई का बोझ वहॉ की नदियॉ और तालाब ढ़ो रहे हैं। शहरवासियों को पानी की आपूर्ति और मल की निकासी से इतर जलस्रोतों के प्रदूषण का उपाय करने की र्फुसत नहीं है। शिक्षित वर्ग पानी के बिल माफ करने के लिए आंदोलन करता है। मैला शोधन के लिए कीमत नहीं देना चाहता पर दुरदराज से पानी लाना अपना अधिकार समझता है।

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जल दोहन, नदी स्वच्छता, मैला प्रथा उन्मूलन, जैविक खेती आदि विषयों पर काम करने वाले समाजिक संगठन अपनी अपनी मुहिम अलग अलग चलाए हुए है जबकि सबके मुद्दे एक दुसरे सरोकार रखते हैं। यही हाल सरकारी विभागों का है। शौचालय बनाने वाली, पानी आपूर्ति करने वाली, मैला साफ करने वाली, नदी की सफाई एवं खेती मंत्रालय एवं विभाग एक दुसरे की योजनाओं और उनसे होने वाले दुष्परिणामों से या तो अनभिज्ञ हैं या फिर बिना सामाजस्य के काम कर रहे है।

शुचिता और शौचालय निर्माण में मूल अंतर है। शुचिता के व्यापक अर्थ में मानव और घरों की स्वच्छता से लेकर नदी और खेती की स्वस्थ्ता भी मायने रखती है। शुचिता और शौचालय आधुनिकता और परंपरा का टकराव नहीं अपितु दोनों के मध्य सामाजस्य है। एंटी-बायोटिक दवाओं और सफाई में प्रयुक्त रसायनों से जीवाणुओं और रोगाणुओं में पनपी प्रतिरोधी शक्ति भविष्य में चिंता का सबब बनने जा रही है। शुचिता की परख असल में हमारा प्रकृति के साथ संबंधों की पड़ताल है। ईकोसैन शौचालय मनुष्य के शरीर को खेत से जोडता है। यह काम लद्दाख के छागरे भी करत हैं। डीवाटस् का तरीका हमें जल स्रोतों के विनाश के अधर्म से बचाता है। पूर्वी कोलकाता और मुदिअली के मछुआरों के परंपरागत तरीके से नई समस्या के मौलिक समाधान करत है।

हमारे मल में माटी की उर्वरता, वायुमंडल का नाईट्रोजन, पहाड़ो और भूतल का फास्फोरस, जीवाणुओं की जीवनलीला समाई है। कुछ पलों के लिए ही सही परंतु जल, थल व मल का निराकार होने वाला यह संबंध हमारे शरीर के नीचे एकदम साकार हो जाता है।

भीम सिंह रावत SANDRP (we4earth@gmail.com)

पुस्त़क की संक्षिप्त समीक्षा पढ़ने के लिए देखेंः- शौचालय निर्माण से शुचिता की ओर-1 (जल-थल-मल पुस्तक समीक्षा)

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