पंचेश्वर बॉध की अनुचित, अन्यायपूर्ण एवं गैरकानूनी पर्यावरण जनसुनवाई रद्द हो

Featured Image: Saryu River winding through Pithoragarh by Sumit Mahar, HIMDHARA

This is Hindi version of SANDRP petition submitted to District Magistrate Almora, Pithoragarh and Regional Official, Environment Protection and Pollution Control Board, Uttarakhand pleading them to postpone the unfair and unjust public hearing of Pancheshwar Multipurpose Project on Mahakali River. The English version of same can be seen here https://sandrp.wordpress.com/2017/08/10/cancel-pancheshwar-dam-public-hearings-it-involves-too-many-violations-and-illegalities/

भीम सिंह रावत, सैनड्रप,

we4earth@gmail.comhttps://sandrp.wordpress.com/

पंचेश्वर बॉध पर्यावरण जनसुनवाई, 

अल्मोडा, उत्तराखण्ड, 17 अगस्त 2017 

सेवा में, 

अध्यक्ष पंचेश्वर बॉध पर्यावरण जनसुनवाई, 

एवं जिलाधिकारी, अल्मोडा उत्तराखण्ड

dm-alm-ua@nic.in

  
अध्यक्ष क्षेत्रीय कार्यालय प्रभारी

उत्तराखण्ड पर्यावरण सुरक्षा एवं प्रदूषण निंयत्रण बोर्ड देहरादून, 

dkjoshi21@yahoo.com

आदरणीय पंचेश्वर बॉध पर्यावरण जनसुनवाई अधिकारिक सदस्य दल,  

आज पंचेश्वर बॉध परियोजना की अल्मोडा जिले में तय तीसरी एवं अंतिम पर्यावरण जनसुनवाई, पूरी तरह से पर्यावरण प्रभाव आकलन Environment Impact Assessment (EIA) राजपत्र 2006 के नियमों के विपरीत है। अतः इस जनसुनवाई को निरस्त कर, प्रभावित गॉववासियों से समोचित चर्चा के बाद, भविष्य में यथोचित स्थान पर जनसुनवाई कि जानी चाहिए। 

इस जनसुनवाई को निरस्त करने के अनेक कारणों में से कुछ मूल कारणों को निम्नांकित किया जा रहा है। 

1. अगस्त के माह में पूरे पर्वतीय क्षेत्र में निंरतर भारी बारिशें होती रहती है। अब तक बादल फटने की करीब एक दर्जन घटनाएॅ सामने आ चुकी है। योजना से प्रभावित तीनों जिलों चम्पावत, पिथौरागढ़ एवं अल्मोड़ा में अनेक सड़के क्षतिग्रस्त है जिस कारण बड़ी संख्या में योजना प्रभावित ग्रामीण इस जनसुनवाई में शामिल नहीं हो सकते हैं। पिथौरागढ़ में तो 11 अगस्त 2017 को आपदा विभाग द्वारा भारी बारिश की चेतावनी के बावजूद जनसुनवाई करायी गयी । ज्ञात हो कि 10 अगस्त को जिले के बरम क्षेत्र में बादल फटने से भारी नुकसान हुआ और रास्तों तथा पुलियों के बहने से 25 से 30 गॉवों के ग्रामीण जनसुनवाई में भाग नहीं ले पाए।

2. जनसुनवाई में अधिकाधिक ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए योजना से संबंधित आवश्यक दस्तावेज प्रभावित लोगों तक नहीं पहुॅचाए गए है। योजना की विस्तृत योजना रिपोर्ट Detailed Project Report (DPR) पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट जैसे अतिमहत्वपूर्ण दस्तावेज जो कि एक सार्थक जनसुनवाई का आधार हैं, केवल अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं तथा इनका सार प्रभावित ग्रामीणों तक स्थानीय भाषा में पहुॅचाने के कोई भी प्रयास नहीं किए गए है।

3. योजना का सार रिपोर्ट ना केवल अविश्वनीय है परंतु इसमें पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट का हिंदी रूपांतरण भी दोषपूर्ण एवं जटिल है।   

4. जनसुनवाई को नियमानुसार प्रभावित क्षेत्रों के केंद्रीय स्थानों पर किए जाने के प्रावधान हैं परंतु पर्वतीय भौगोलिक स्थितियों की अवेहलना कर पंचेश्वर बॉध की जनसुनवाई प्रभावित क्षेत्रों से कोसों दूर करायी जा रही है जिसके कारण, योजना प्रभावित किसान, ग्रामीण, महिलाएॅ एवं मजदूर जनसुनवाई में भाग नहीं ले पा रहे हैं। 

5. किसी भी स्थिति में मानसून के समय में इतनी विशालकाय परियोजना की जनसुनवाई करवाना औचित्यहीन है।

6. जनसुनवाई के नियमानुसार मात्र अध्यक्ष/जिलाधिकारी एवं समकक्ष अधिकारी एवं प्रदूषण निंयत्रण अधिकारी ही मंच पर बैठ सकते हैं, परंतु पिथौरागढ़ और चंपावत की जनसुनवाई में इस कानून का दिन दहाडे उल्लखंन किया गया। दोनों ही जनसुनवाईयों में स्थानीय राजनेता मंच पर ना केवल विराजमान हुए, अपितु जनसुनवाई में भी अनुचित हस्तक्षेप किया।  

7. इसी प्रकार से जनसुनवाई स्थलों पर पुलिस एवं अर्द्धसैनिक बलों की अनावश्यक तैनाती, जनसुनवाई की प्रजातांत्रिक प्रक्रिया पर नकारात्मक असर डाल रही है।  

8. यह जनसुनवाई मात्र तीन जिलों में हो रही है जबकि इस योजना उत्तरप्रदेश के अनेक जिले पीलीभीत, लखीमपुर आदि भी प्रभावित होगें जहॉ कोई भी जनसुनवाई नहीं करायी जा रही है। इन जिलों में भी पर्यावरण जनसुनवाई करवाना नितांत आवश्यक है। 

9. योजना की पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट के साथ योजना का सार, सरल भाषा में कम से कम एक माह पूर्व सभी ग्राम पंचायतों में पहुॅचाया जाना चाहिए था परंतु ऐसा नहीं हुआ है। साथ में ऐसे जटिल दस्तावेजों को सरलीकरण कर ग्रामीणों को समझाने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।  

10. पंचेश्वर बॉध का निर्माण स्थल भूकंप के नजरिए से अति संवेदनशील है। विशेषज्ञों के अनुसार यहॉ एक बड़ा भूकंप दशकों से लंबित है । नेपाल में वर्ष 2015 में आए विनाशकारी भूकंप में भी इस क्षेत्र की जमा भूगर्भीय उर्जा नहीं निकली है। इतने संवेदनशील क्षेत्र में इस विशालकाय बॉध का निर्माण आत्मघाती कदम है। दुर्भाग्य से योजना की पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA दस्तावेज इस पहलू के दुष्परिणामों को नजरअदांज करती है। 

11. यह पर्वतीय क्षेत्र भूस्खलन, बादल फटने, ग्लेशियर फटने, मृदा क्षरण, तत्काल बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं से ग्रसित है। इस कारण वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा में क्षेत्र में स्थित धौलीगंगा जल विद्युत परियोजना को खासा नुकसान हुआ था। जबकि योजना का पर्यावरण प्रभाव आकलन दस्तावेज इस ओर कोई ध्यान नहीं देता है। टिहरी बॉध क्षेत्र में भूस्खलन से प्रभावित गॉवों की संख्या बढ़ती जा रही है। यही स्थिति पंचेश्वर बॉध के साथ भी होगी। अतः इस क्षेत्र में इतना विशाल बॉध बनाने की कोशिश आपदा को दावत देना है। 

12. इस योजना का पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट मूलतौर पर ही गलत, अपर्याप्त एवं दोयम दर्जे का दस्तावेज है। इसमें मौजूद कुछ मुख्य खामियों को निम्नाकिंत किया जा रहा है। 

  • पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में ना तो योजना के अन्य विकल्पों का आकलन हुआ है ना ही योजना से इतर विकल्पों पर प्रकाश डाला गया है। 
  • पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट में, पंचेश्वर बॉध के निचले इलाकों में पड़ने वाले असर का मूल्यांकन नहीं किया है। इन्हीं वजहों से भारी स्थानीय विरोध के चलते अरूणाचल प्रदेश में 2000 मेगा वाट की सुबानसीरी जल विद्युत परियोजना अधर में लटकी हुई है। पंचेश्वर बॉध की भी यही स्थिति होने के पूरे आसार है। 
  • गौरतलब है कि भारत सरकार के पर्यावरण एवं जल मंत्रालय ने माननीय उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर माना है कि बडे़ बाधों से गंगा के वजूद पर खतरा मंडरा रहा है। पंचेश्वर बॉध योजना गंगा बेसिन में ही है परंतु इस बॉध के गंगा नदी पर होने वाले प्रभावों का आकलन नहीं किया गया है। 
  • पंचेश्वर बॉध पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन नहीं किया गया है। यह भी नहीं समझा गया है यह बॉध किस प्रकार से जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचने के उपायों को प्रभावित करेगा। इय बॉध से 1600 हैक्टेयर का अमूल्य वन क्षेत्र नष्ट हो जाएगा जिससे जलवायु परिवर्तन की घातकता बढेगी। पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट इस तथ्य को शामिल नहीं करती है।
  • वैज्ञानिक साबित कर चुके है कि बॉधो से मिथेन गैस का उत्सर्जन होता है। मीथेन गैस, कार्बन डाई आक्साइड से 21 गुणा ज्यादा खतरनाक है। परंतु पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख नहीं है कि यह बॉध कितनी मात्रा में मीथेन गैस छोडेगा। 
  • योजना के जल विद्युत घटक का प्रयोग जरूरत के समय उत्पादन (Peaking Power) सिद्धांत पर प्रायोजित है, जिससे नदी के निचले भागों में आमूलचूल विपरीत प्रभाव पडे़गे। पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट में इसका कोई आकलन नहीं है।
  • पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि इतनी विशाल योजना के लिए रेत, बालू, पत्थर आदि निमार्ण सामग्री कहॉ से लाई जाएगी एवं इसके लिए होने वाले खनन के क्या नकारात्मक प्रभाव पडे़गे। 
  • सरल समीकरणों में भी पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट बडी ही त्रुटिपूर्ण है जैसे कि इसके अनुसार बॉध स्थल तक शारदा नदी का जलागम क्षेत्र 12,276 वर्ग किमी है, इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि शारदा नदी का नेपाल में कुल जलागम क्षेत्र 4456 वर्ग किमी और भारत में 9720 वर्ग किमी है जिसका कुल योग 14176 वर्ग किमी होता है नाकि 12276 वर्ग किमी। 
  • पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट आंरभ (Vol 1, Chap 2) में ही स्पष्ट कहती है कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य बिजली पैदा करना है जिसका सीधा सा अर्थ है कि बाढ़ नियंत्रण से इस योजना का ज्यादा कुछ लेना देना नहीं है। 

13. इस योजना की पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट अधूरी एवं अंर्तराष्ट्रीय न्यायालय के मानकों के विपरीत है। पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट केवल भारतीय क्षेत्रों तक ही समिति है और इसमें नेपाल में योजना से ऊपर एवं निचले इलाकों का आकलन शामिल नहीं है। इस प्रकार यह रिपोर्ट अधूरी है। अतः इस अधूरे दस्तावेज के आधार पर कोई भी फैसला नहीं लिया जा सकता ना ही इसके आधार पर जनता से रायशुमारी करने का कोई औचित्य है।  

एक प्रकार से पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट अंर्तराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा तय मानकों का उल्लंखन है जिसके तहत दो देशों के बीच बनने वाली योजना का मूल्यांकन दोनों देश मिलकर करेगें।यही बात अंर्तराष्ट्रीय बॉध आयोग भी कहता है जिसकी बैठक में भारत और नेपाल दोनों ने भाग लिया है।  

14. भारत के उर्जा मंत्री के राज्यसभा में दिए हालिया बयान अनुसार हमारा देश बिजली उत्पादन में अत्यधिक परिपूर्ण है और बिजली का निर्यात भी कर रहा है। बिजली की मॉग ना होने से, भारत के कोयला आधारित बिजली संयंत्र क्षमता से नीचे काम कर रहे हैं। अक्षय उर्जा सौर एवं पवन से बिजली उत्पादन में भारी इजाफा हुआ है। साथ में बिजली आपूर्ति एवं उपयोग दक्षता भी बढ़ी है। इन सब बातों के चलते भारत आगामी कई सालों तक बिजली में एक परिपूर्ण राष्ट्र बना रहेगा और बिजली बनाने के लिए नए बॉधो की कोई जरूरत नहीं है। 

15. उर्जा मंत्री संसद के भीतर और बाहर बार बार यह भी कह रहे हैं कि देश में 11000 मेगावाट की जल विद्युत योजनाएॅ, सारी मंजूरियों के बावजूद फॅस गई है। जिसका कारण पैसे की कमी एवं पानी से बिजली उत्पादन में बढ़ती लागत है। इन्हीं कारणों के चलते अनेक निजी कंपनियॉ जलविद्युत परियोजनाओं को छोड़कर भाग रही है। 

पंचेश्वर बॉध से बिजली पैदा करने में भी प्रति मेगावाट कम से कम 12 करोड़ रूपए खर्च होने का अनुमान है। इस योजना से सालना 20 लाख यूनिट बिजली बनाने का अनुमान है जिसमें रियायत देने पर भी उत्पादन खर्चा 8 से 9 रूपए प्रति यूनिट खर्चा आने का अनुमान है। जबकि जूलाई 2017 में बाजार में उपलब्ध बिजली की कीमत 2 रूपए 49 पैसे है और यह कीमत लगातार गिरती जा रही है। ऐसे में सरकार क्यों इस योजना को बनाने जा रही है जिसका मुख्य उद्देश्य ही बिजली बनाना है। परंतु पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट पूरी तरह से इन तथ्यों की अनदेखी करता है।

16. यह योजना महाकाली संधि 1996 के तहत प्रस्तावित है। महाकाली नदी गंगा बेसिन का हिस्सा है। महाकाली संधि अपने आप में पुरानी एवं अव्यवाहरिक है। इसके तहत {Article-1 (2)}, भारत को शारदा बैराज से नीचे नदी में हर वक्त 350 क्यूसेक जल प्रवाह बनाए रखना है। यह जल राशि पूरी तरह से नाकाफी है। अब ऐसी संधियॉ प्रचलन से बाहर है। आज विशेषज्ञ और अनेक देश इस बात पर सहमत हैं कि किसी भी स्थिति में नदी के कुल प्रवाह का लगभग 50 फीसदी पानी नदी में ही बहना चाहिए। ऐसा इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा आई आई टी (IIT) द्वारा गंगा नदी बेसिन प्रबंधन रिपोर्ट में भी कहा गया है। जबकि वन विशेषज्ञ समिति ने तो गंगा बेसिन में मौजूद केन बेतवा नदी में गैर मानसूनी महीनों में 100 प्रतिशत जल प्रवाह बनाने की बात कही है। ऐसे में महाकाली संधि पुरानी एवं अव्यवाहरिक हो चुकी है जिसका पनः मूल्यांकन किया जाना बेहद जरूरी है।  

17. योजना का खाका तैयार करने वाली Water And Power Consultancy Limited (WAPCOS) कंपनी विवादों से घिरी है। यह कंपनी पूरी तरह से पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट बनाने में अयोग्य है। पर्यावरण प्रभाव आकलन एक लोकतांत्रिक एवं निर्णय लेने की प्रक्रिया का वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य एवं अपनाया गया आधुनिक तरीका है ना कि पर्यावरण एवं जनता के लिए विनाशकारी योजनाओं में औपचारिकता पूरी करने का जरिया। इसके तहत आकलन किया जाता है कि किसी भी योजना के पर्यावरण एवं मानव समाज पर क्या दुष्प्रभाव पड़ रहे है। यह प्रक्रिया इतनी खुली है कि इसमें इस नतीजे पर भी पहुॅचा जा सकता है कि कोई योजना नाजायज साबित हो सके। परंतु WAPCOS फिर भी कभी ऐसे नतीजे पर नहीं पहुॅचती और विवादास्पद एवं विरोधाभाषी योजनाओं के लिए जानी जाती है। जिसके निम्न कारण है। 

WAPCOS कंपनी केन्द्रीय जल मंत्रालय के मातहत है। (http://wrmin.nic.in/forms/list.aspx?lid=248) केन्द्रीय जलमंत्रालय स्वंय योजनाओं को बनाने व बढाने वाला मंत्रालय है। अतः इसी मंत्रालय के तहत आने वाली कंपनी से एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मूल्यांकन की अपेक्षा करना बेईमानी है। 

WAPCOS कई दशकों से योजनाओं को किसी भी कीमत पर आगे धकेलने के लिए विख्यात है। यह योजनाओं के लिए पूर्व संभावना, संभावना, सर्वेक्षण (Pre-feasibility, Feasibility, Survery) एवं DPR आदि रिपोर्ट  बनाती हैं। इस प्रकार के उपक्रम से हम कैसे उम्मीद करे कि यह पर्यावरण अनुकूल फैसले लेगी और निष्पक्ष पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट बनाऐगी।अतः इस कंपनी से पर्यावरण संबंधी कोई भी मूल्याकंन कराना अनुचित है। 

यह कंपनी असफल योजना को सफल दिखाने के लिए दर्जनों अध्ययन करती है। अतः इससे योजना के पर्यावरण प्रभावों की स्वतंत्र, निष्पक्ष आकलन की आशा करना भूल है। 

WAPCOS दोयम दर्जे एवं खानापूर्ति करने के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA रिपोर्ट बनाने के लिए जानी जाती है। इसके कुछ उदाहरण नीचे दिए गए सुत्रों पर हैं, 

  1. httrps://sandrp.wordpress.com/2014/08/19/sach-khas-hydro-project-in-chenab-basin-another-example-of-wapcoss-shoddy-eia/
  2. https://sandrp.wordpress.com/2013/11/15/mohanpura-dam-in-madhya-pradesh/
  1. https://sandrp.wordpress.com/2014/02/22/chinki-major-irrigation-project-on-narmada-yet-another-evidence-of-mps-obsession-with-large-irrigation-dams-wapcoss-shoddy-reports/
  2. https://sandrp.wordpress.com/2014/01/15/eia-emp-of-kalai-ii-hydropower-project-doesnt-comply-with-its-terms-of-reference/

सारः- उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि चंपावत 9 अगस्त, पिथौरागढ़ 11 अगस्त, एवं अल्मोड़ा 17 अगस्त में पंचेश्वर बॉध से संबधित पर्यावरण जनसुनवाई, पर्यावरण प्रभाव आकलन EIA राजपत्र 14 सितंबर 2006 का खुलेआम उल्लंखन है। ऐसे में उपरोक्त सभी एवं अन्य आवश्यक संबंधित मुद्दों के निराकरण तक इस जनसुनवाई को निरस्त कर देना ही सर्वोचित है। अन्यथा यह पर्यावरण जनसुनवाई कानूनी वैधता प्राप्त नहीं कर पाएगी।  

आपका धन्यवाद! 

प्रार्थी ! 

हिमांशु ठक्कर सैनड्रप एवं भीम सिंह रावत 

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